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Sunday, December 29, 2013

फारूक शेख

25मार्च1948-27दिसंबर2013
फिल्म इंडस्ट्री में कई कलाकार ऐसे हैं जैसे एक सुंदर घर में रौशनी के श्रोत।अगर,देखने में बाहर से बहुत ही सुंदर है इंडस्ट्री तो भीतर की रौशनी हैं वो कलाकार जो किसी नम्बर की दौड़ में भाग अपने हुनर की चमक को ज़ाया नहीं करते।
फारुक शेख ऐसे ही सितारे थे,जिनकी रौशनी भले ही ज्यादा चकाचौंध भरी न थी मगर उनके बिना इंडस्ट्री उस प्रकृति की तरह अधूरी हो गई लगती है जिसमें सूरज चाँद तो हों,सितारे न हो।
इंडस्ट्री से एक ऐसा हीरा छिन गया जो थिऐटर समेत कई फिल्मों की चमक से हिंदी सिनेमा के ख़जाने को चमकाये हुए था।वो एक बढ़ीया एंकर भी थे।उनके अभिनय की खासीयत ही थी कि उनकी फिल्में आज भी बहुत अच्छी लगती है,मानों वे अदाकारी न कर रहे हों ब्लकि सच मे वही व्यक्ति हों जो पर्दे पे दिखाया जा रहा हो।
आज वो हमारे बीच नहीं रहे,मगर वो अपनी बेहतरीन फिल्मों के ज़रीऐ हमेशा हमारे यादों में जिंदा रहेंगें।

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Saturday, November 30, 2013

मन जीतै...जग जीत।

मन की भी अपनी मौज है।कभी लगता है कि सब व्यर्थ है...और कभी सबकुछ अपना बनाने की होड़ में भागने लगता है।इस मन को समझने की कोशिश सदीयों से जारी है..ऋषि मुनी,ज्ञानी...हर कोई अपने अनुभव के अनुसार जनमानस के कल्याण हेतु अलग-अलग तरीकों से लोगों को इस विष्य पर समझाते रहे हैं।लेकिन,हर जीव के मन की अवस्था अलग है..और उसी अवस्था के परिणाम भी अलग हैं।जहाँ तक मेरी समझ काम करती है..मैं मानता हूँ कि मन अगर किसी सही काम में लग जाये तो इससे बेहतर कोई साथी नहीं है।अगर हमारा जीवन अव्यवस्थित तरीके से जीया जा रहा है तो परिणाम भी सार्थक नहीं होंगें।सबसे पहले हमें अपने जीवन को जीने के ढ़ंग को बदलना चाहिए...शुरुआत में अपने जीवन लक्षय को निर्धारित करना,फिर तय लक्षय की पूर्णता हेतु अपने प्रयासों को..कोशिश रुपी धागे में पिरोना और फिर अपना तन-मन पूरी तरह उसी कार्य को करने मे झोंक देना..ताकि हमें जीने का मक्सद मिल सके।फिर अपने आप घटने वाली घटनाओं से आपका अपना मन सही दिशा में सक्रिय हो जायेगा और रम जायेगा।आहिस्ता-2 सब सवालों से रुबरु आपका मन खुद जवाब ढूंढने में सक्षम हो जायेगा व व्यर्थ छूटता चला जायेगा।

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Sunday, September 29, 2013

धुंधली यादें 22DISHA

ये तस्वीरें मेरे नाना-नानी जी की हैं।जो अब इस दुनियाँ में नहीँ हैं,लेकिन हमारे ज़हन में उन्की यादें हमेशा जीवित रहेंगीं।
इन दोनों की जिंदगी बहुत मुशकिलों भरी थी,मगर दोनों जब तक जीये,बडी जिंदादिली से जीये।जिंदगी अपनी ही धुन में बितायी।5 बेटीयाँ ही थीं उनके यहाँ,एक बेटा जो बहुत छोटी उम्र में ही गुज़र गया था।सब बेटीयों का पालन पोष्ण और बेटे को खोने का गम,फिर भी जीने का होंसला,मैं कभी-कभी सोचता हूँ कि इतना साहस जुटा पाना,हर किसी के बस की बात नहीं होती।
खैर,मैँ काफी छोटा था जब नाना जी एक ऍक्सीडैंट में हमें छोड गये और कई वर्षो तक साहस जुटाये जीने के बाद आखिर नानी भी इस दुनियाँ से चली गयीं।
उनके साथ बहुत कम वक्त गुजारा है,तो धुंधली सी यादें हैँ दिमाग में,लेकिन उन्हे याद रखने के लिए काफी है।मैनें उनकी ये तस्वीरें बनायी हैं,जो यादों को ताज़ा रखने का माध्यम भी हैं और उनके प्रति हमारा स्नेह भी।
हमारे बुजुर्ग असल में जिंदगी का पूरी किताब की तरह होते है,जिस में से सीख लेकर हम अपनी कमीयों को सुधार सकते है,लेकिन ये अवसर हर किसी को नहीं मिलता।
अपने बुजुर्गों का सम्मान करें और उनके स्नेह के हकदार बनें।

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Thursday, September 5, 2013

ਤਰੱਕੀ ਦੀ ਰਾਹ

ਇੱਕ ਪਾਸੇ ਤਾਂ ਅਸੀਂ ਸੁਣਦੇ ਹਾਂ ਕਿ ਸਾਡਾ ਭਾਰਤ ਦੇਸ਼ ਤਰੱਕੀ ਦੀ ਰਾਹ ਤੇ ਅਗਾਂਹ ਵਧ ਰਿਹਾ ਹੈ,ਸਾਡੀਆਂ ਸਰਕਾਰਾਂ ਬਹੁਤ ਉਪਰਾਲੇ ਕਰ ਰਹੀਆਂ ਨੇ ਕਿ ਭਾਰਤ ਮੋਹਰੀ ਦੇਸ਼ਾ ਦੀ ਕਤਾਰ ਵਿੱਚ ਜਾ ਖੜੋਵੇ।ਸਾਡੀ ਜਨਤਾ ਦੁਨੀਆਂ ਦੀ ਕਿਸੇ ਵੀ ਸ਼ੈ ਨੂੰ ਵਰਤਨ ਜਾਂ ਵੇਖਣ ਤੋਂ ਕਿਤੇ ਵਾਂਝੀ ਨਾਂ ਰਹਿ ਜਾਵੇ,ਚਾਹੇ ਪੜਾਈ ਦੇ ਖੇਤਰ ਵਿੱਚ,ਚਾਹੇ ਵਿਦੇਸ਼ੀ ਖਾਣਪੀਣ ਜਾਂ ਪਹਿਨਣ ਪੱਖੋਂ।ਪਰ ਕੀ ਕੋਈ ਰਾਸ਼ਟਰ ਬਿਨਾਂ ਆਪਣੀਆਂ ਜੜਾਂ ਮਜਬੂਤ ਕਿਤਿਆਂ ਕਿਵੇਂ ਉਹਨਾਂ ਸ਼ਿਖਰਾਂ ਨੂੰ ਛੂਹ ਸਕਦਾ ਏ,ਜਿਹਨਾਂ ਦੀ ਬੁਨਿਆਦ ਹੀ ਕਮਜ਼ੋਰ ਤੇ ਦਬੇ ਕੁਚਲੇ ਤੇ ਓਹਨਾਂ ਗਰੀਬ ਲੋਕਾਂ ਦੀਆਂ ਟੁੱਟੀਆਂ ਉਮੀਦਾਂ ਦੀ ਲਾਸ਼ਾਂ ਤੇ ਰੱਖੀ ਗਈ ਹੋਵੇ।ਸੁਵਿਧਾਵਾਂ ਦੇ ਨਾਂ ਤੇ ਆਮ ਅਾਦਮੀ ਨਾਲ ਕੋਝਾ ਮਖੌਲ ਕੀਤਾ ਜਾਂਦਾ ਏ,ਨਾਂ ਤਾਂ ਇਸ ਦੇਸ਼ ਵਿੱਚ ਗਰੀਬਾਂ ਨੂੰ ਚੱਜ ਦੀ ਪੜਾੲੀ,ਨਾਂ ਰੋਟੀ ਕਮਾ ਕੇ ਖਾਣ ਦੀ ਵਿਵਸਥਾ ਤੇ ਨਾਂ ਹੀ ਸਿਹਤ ਸੇਵਾਵਾਂ ਨੇ । ਵੇਖਣ ਨੂੰ ਹੈ ਪਰ ਵਰਤਣ ਲਈ ਕੁਝ ਨਹੀਂ। ੲਿਹ ਸਭ ਜਾਣਦੇ ਨੇ ਕਿ ਸਰਕਾਰਾਂ ਦੇ ਦਿੱਤੇ ਹੱਕ ਜਨਤਾਂ ਕਿੰਨੇ ਕੁ ਵਰਤ ਸਕਦੀ ਹੈ । ਖਾਣਪੀਣ,ਪੜਾੲੀ,ਬਜੁਰਗਾਂ ਲੲੀ ਪੈਨਸ਼ਨਾਂ ਤੇ ਮੈਡੀਕਲ ਸਹੂਲਤਾਂ ਦੀ ਜਿਹੜੀ ਕਾਣੀ ਵੰਡ ਹੁੰਦੀ ਹੈ,ਉਸ ਤੋਂ ਵੀ ਸਭ ਜਾਣੂ ਹਨ ਬਹੁਤ ਵਿਉਂਤਾ ਬਣਨ ਤੋਂ ਬਾਅਦ ਜੋ ਕੁਝ ਜਨਤਾ ਲੲੀ ਭੇਜਿਆ ਜਾਂਦਾ ਹੈ ਉਸ ਵਿੱਚੋਂ ਦਸ ਜਾਂ ਵੀਹ ਪ੍ਰਤੀਸ਼ਤ ਹੀ ਲੋਕਾਂ ਤੱਕ ਪਹੁੰਚਦਾ ਹੈ। ਬਾਕੀ ਤਾਂ ਸਰਕਾਰੀ ਕੁਰਸੀਆਂ ਦੀ ਭੇਟ ਚੜ੍ਹ ਜਾਂਦੈ । ਉਸ ਬਚੇ ਕੁਚੇ ਨੂੰ ਲੈਣ ਲੲੀ ਜਿੱਥੋਂ ਦੇ ਲੋਕ ਅਾਪਸ ਵਿੱਚ ਲੜ ਮਰਦੇ ਹੋਣ ਤਾਂ ਕੋੲੀ ਕਿਵੇਂ ਕਹਿ ਸਕਦਾ ਹੈ ਕਿ ਅਸੀਂ ਕੋੲੀ ਵਿਕਾਸ ਕੀਤਾ ਤੇ ਅਸੀਂ ਅੱਗੇ ਵਧ ਰਹੇ ਹਾਂ।

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Tuesday, September 3, 2013

डोल रहा विश्वास

आज जो हालात भारत मेँ कन्या भ्रूण और नाबालिग लडकीयों के यौन शोषण को
लेकर बने हुए हैं वो गहन चिंता का विष्य होने के साथ साथ भारत की महान
संस्कृति की साख पर बदनुमा दाग़ हैं।
और उसपे त्रासदी ये भी है कि जिस भारत वर्ष को आध्यात्मिक देश का दर्ज़ा
हासिल है उस भूमि पर जो ये घिनौने कृत्य अंजाम दिये जा रहे हैं उन्मे आम
आदमी से ज्यादा साधु-संतों का शुमार होना निहायत ही शर्म की बात है।साधु
संत याँ आध्यात्मिक गुरुओँ का नाम ऐसे प्रकरणोँ में आना समाज में खत्म हो
रही नैतिकता का वो रुप हैं जिसके आगे हम और इन्सानों से किसी प्रकार की
नैतिकता की आस लगायें तो बेमानी होगी।क्योंकि हमारे पूर्वजों के समय से
जो संस्कारों की शिक्षा का हवाला इस देश के बच्चों को दिया जाता रहा है
उन संसकारों के मंदिर में साधु महात्माओं का स्थान शीर्ष पर है और भगवान
स्वरूप उन्हे मान्यता प्रदान की गयी है:
तीन लोक नौ खंड में,गुरु से बडा न कोये,
कर्ता करे न कर,सके गुरु करे सो होये;
पिछ्ले कुछ समय से ऐसी वारदातें लोगों के विश्वास को तार तार कर रहीं हैं।
मेरी व्यक्तिगत राय है कि इन सबके पीछे मौजूद पुख्ता कारण जो है वो ये कि
साधु-संत,और गुरुजनों की जीवनशैली अब वैसी न होना जैसी का पुरानें समयोँ
में वर्णन मिलता है।
देखिये,सुख सुविधायें तो उन पुरानें वक्तों में भी बहुत थीं,जब उन्हें
त्याग लोग सन्यासी बनते थे।परमात्मा की खोज में सब सुविधायें छोडछाड वो
आश्रमों में कठिन परिस्थितियों को अपनाकर अपना जीवन व्यतीत करते थे,और
मुक्ति की खोज और समस्त जीवों के कल्याण हेतू अपना जीवन अर्पण कर देते
थे।
क्या आज कोई भी संत आपको उस कोटि का दिखाई पडता है?मेरी जिंदगी में तो
वैसा न मैनें किसी से सुना और न खुद देखा है।आजकल के ज्यादातर गुरु बातें
तो बहुत उँचीं करते हैं,लेकिन उनको न तो वो अपने भक्तों के जीवन में उतार
पाते हैं और न हीं खुद उन बातों पर खरे उतरते हैं।
भक्तों की बेशुमार भीड,करोडों रुपयों की लागत से तैयार आश्रम,खुद का
अत्याधुनिक सुविधायें जैसे महंगी कारें,मोबाइल,एसी कुटियायें और देश
विदेश की यात्रायों से लैस होना,एक प्रकार का 'भोग' ही तो
हैं।भोग-विलास,अंहकार और लालच जैसी जिन बुरी आदतों को छोड साधु का चोला
पहना जाता है,उन्ही को वो दोबारा से ग्रहण कर,किस तरह का भला जनता का कर
सकते है?इन बातों से मैं,आप सभी भलीभांति परिचित्त हैं।

Tuesday, August 27, 2013

वाकई,शौक बडी चीज़ है..!

बहुत वर्षों के बाद आज फिर पैनसिल को पकडा तो पहले ये लगा कि जैसे सब भूल गया,लेकिन बिना सोचे जो पेपर शीट और पैनसिल कलर ले आया था सोच रहा था,उनका करुँ क्या ?तभी मेरे बेटे ने कहा पापा,ये कलर हमेँ दे दो और हमे ड्राईंग करना सिखाओ ।फिर न चाहते हुए भी उनके लिए एक चित्र बनाना शुरु कर दिया।आहिस्ता आहिस्ता उस चित्र को बनाने मे रम गया।पता ही नहीँ चला कब बच्चे मुझे चित्र बनाता छोड अपना खेल खेलने लगे।पर,मैँ तो सब भूल कर खो गया अपने उस शौक को पूरा करने में,जो पता नहीं कब का खो गया था जिंदगी की दौडधूप में।
जैसे जैसे मैं चित्र बनाता गया,मुझे लगने लगा कि मैनें बेवजह अपने शौक का गला घोंट दिया था,अब ऐसा नहीं होगा।मैँ आज से ही किसी न किसी तरह अपने शौक (जो कभी मेरी जिंदगी का लक्षय था)से जुडा रहूंगा।
जो दिक्कतेँ,परेशानीयाँ अकसर हमारी जिंदगी पे हावी रहती हैं,उन से कुछ पल निज़ात पाने का ये सबसे बढीया तरीका भी है।
(उस चित्र की एक प्रति मैँ यहाँ पोसट कर रहा हूँ)

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Saturday, August 24, 2013

'ਦੀਸ਼ਿਆ' ਇਸ਼ਕ ਮਜਾਕ ਨਹੀਂਓ

ਨੈਣਾਂ ਦੀ ਗੱਲ ਕਰਨ ਲੋਕੀਂ
ਹੱਸ-ਹੱਸ ਦੱਸਣ ਬਾਤਾਂ,
ਸੱਚੀਂ ਜਿਹਨਾਂ ਦੀਆਂ ਲੜੀਆਂ ਅੱਖਾਂ
ਮੂਹੀਂ ਬੋਲ,ਨਾਂ ਨੈਣੀ ਨੀਂਦਰ
ਬਹਿ-ਬਹਿ ਕੱਟਦੇ ਰਾਤਾਂ
'ਦੀਸ਼ਿਆ' ਇਸ਼ਕ ਮਜਾਕ ਨਹੀਂਓ
ਆਪਣਾ-ਆਪ ਗੁਆ ਕੇ ਆਵਣ
ਇਹਨਾਂ ਰਾਹਾਂ ਦੀਆਂ ਜਾਚਾਂ...

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Tuesday, July 30, 2013

तुम मुक्त हो

एक ही जगत है-यही जगत।फिर चाहो नर्क बना लो,चाहे स्वर्ग।जगत मात्र एक अवसर है।कोरी किताब-क्या तुम लिखोगे,ये तुम पर निर्भर है।और केवल तुम पर।किसी और की कोई जिम्मेवारी नहीँ है।नर्क मेँ जीना हो नर्क बना लो-स्वर्ग मेँ जीना हो स्वर्ग बना लो-तुम्हारे हाथोँ का ही सारा निर्माण है।यहाँ सब मौजूद है।युद्ध करना हो तो युद्ध और प्रेम की छाया मेँ जीना हो तो प्रेम की छाया।शांति के फूल
उगाने होँ तो कोई रोकता नहीँ,निर्वाण के दीये जलाने होँ तो कोई बुझाता नहीँ-और अगर जख्म ही छाती मेँ लगाने होँ तो कोई हाथ रोकने आयेगा नहीँ।
तुम मुक्त हो।तुम स्वतंत्र हो।मनुष्य की यही महिमा है,यही उसका विषाद भी।विषाद,कि मनुष्य स्वतंत्र है;गलत करने को भी स्वतंत्र है।स्वतन्त्रता मेँ गलत करने की स्वतन्त्रता सम्मिलित है।अगर ठीक करने की ही स्वतन्त्रता होती तो उसे स्वतन्त्रता ही क्या कहते।स्वतन्त्रता का अर्थ ही होता है,गलत होने की स्वतन्त्रता भी है।चाहो तो मिटा लो,चाहे तो बना लो।चाहो तो गिर जाओ,मिट्टी और
कीचड मेँ हो जाओ और चाहो तो कमल बन जाओ।
जीवन एक कोरा अवसर है-बिल्कुल कोरा अवसर।जैसे कोरा कैनवास हो और चित्रकार उस पर चित्र उभारे;कि अन-गढ़ पत्थर हो,कि मूर्तीकार उसमेँ मूर्ती निखारे।शब्द उपलब्ध है;चाहो गालीयाँ बना लो और चाहे गीत।इस बात को जितने गहरे मे उतर जाने दो हृदय मे,उतना अच्छा है। भूलकर भी मत सोचना कि कोई तुम्हारे भाग्य का निर्माण कर रहा है।उस बात मे बडा खतरा है।फिर आदमी अवश हो जाता है।फिर जो हो रहा है,हो
रहा है।फिर सहने के सिवाय कोई उपाय नहीँ।फिर आदमी मिट्टी का लौँदा हो जाता है;उसके प्राण सूख जाते हैँ।उसमेँ जीवन की धार नहीँ बहती।चुनौतियोँ को अंगीकार करने की सामर्थ्य खो जाती है।और जहां चुनौतियोँ को अंगीकार करने की सामर्थ्य नही,वहां आत्मा का जन्म नहीँ।आत्मा जनमती है,चुनौतियोँ के स्वीकार करने से।तुफानोँ मेँ पैदा होती है आत्मा।आंधियोँ-अंधड़ोँ मेँ पैदा होती है आत्मा।
(भगवान श्री रजनीश-ओशो)

Friday, July 26, 2013

" ਕਾਮਯਾਬ ਸਮਾਂ "

" ਕਾਮਯਾਬ ਸਮਾਂ "
ਕਾਮਯਾਬ ਹੋ ਰਿਹਾ ਹੈ ਸਮਾਂ
ਆਪਣਾ ਅਸਰ ਦਿਖਾਉਣ ਵਿੱਚ,
ਯਾਦਾਂ ਦੀ ਲਾਸ਼ ਆਪਣੇ
ਪੈਰਾਂ ਥੱਲੇ ਦਫਨਾੳਣ ਵਿੱਚ;
ਮਿੱਟੀ ਦੀ ਧੂੜ,ਜਿਨ੍ਹਾ
ਚਿੱਤਰਾਂ ਉੱਤੇ ਪਈ ਉਹਨਾਂ,
ਤਸਵੀਰਾਂ ਦਾ ਵਜੂਦ ਮਿਟਾਉਣ ਵਿੱਚ;
ਵਿੱਚ ਵਿਛੋੜੇ ਜਿਹੜੀਆਂ,ਤਰ ਅੱਖੀਆਂ,
ਉਹਨਾਂ ਝੜੀਆਂ ਨੂੰ ਸੁਕਾਉਣ ਵਿੱਚ;
ਹਰ ਕੋਈ ਪੁੱਛੇ,ਤਬਦੀਲੀਆਂ ਦਾ ਕਾਰਨ,
ਕਿਹਦਾ ਹੱਥ ਹੈ ਉਹ
ਬੇਹਾਲੇ-ਹਾਲ ਮੁਕਾਉਣ ਵਿੱਚ;
ਕਾਮਯਾਬ ਹੋ ਗਿਆ ਹੈ ਸਮਾਂ,
ਆਪਣਾ ਅਸਰ ਦਿਖਾਉਣ ਵਿੱਚ ;
ਕਾਮਯਾਬ ਹੋ ਗਿਆ ਹੈ ਸਮਾਂ...!
(ਜਗਦੀਸ਼ ਦੀਸ਼ਾ,29-9-1999)

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Wednesday, July 24, 2013

'ਸੁਪਨੇ ਜਿਹਾ ਅਹਿਸਾਸ'

ਅੱਖਾਂ ਐਂਵੇਂ ਜਿਵੇਂ ਬੋਤਲਾਂ ਸ਼ਰਾਬ ਦੀਆਂ
ਤਿੱਖੀ ਨਜ਼ਰ ਨੇ ਕੀਤਾ ਹਲਾਲ ਮੈਨੂੰ,
ਭਾਵੇਂ ਚਾਹੁੰਦੀ ਏਂ ਮੈਨੂੰ ਤੂੰ ਦਿਲੋਂ,ਪਰ
ਲਗੇ ਇਉਂ ਜਿਵੇਂ,ਕਰਦੀ ਏਂ ਮਜ਼ਾਕ ਮੈਨੂੰ,
ਅਸੀਂ ਹੋ ਵੀ ਗਏ ਇੱਕ ਦੂਜੇ ਦੇ,ਪਰ ਫੇਰ ਵੀ
ਕਿਉਂ ਇੱਕ ਸੁਪਨੇ ਜਿਹਾ ਹੁੰਦੈ ਅਹਿਸਾਸ ਮੈਨੂੰ,
ਨਾਂ ਰਹਿਜੇ ਕਿਤੇ ਇਹ ਹਕੀਕਤ ਸੁਪਨਾ ਬਣਕੇ
ਆਖਰੀ ਸਾਹਾਂ ਤੱਕ,ਚਾਹੀਦਾ ਏ ਤੇਰਾ ਪਿਆਰ ਮੈਨੂੰ,
ਲੜ ਜਾਵਾਂ ਪੂਰੀ ਦੁਨੀਆਂ ਨਾਲ,ਜੇ
ਨਹੀਂ ਛੱਡੇਂਗੀ ਸਾਥ ਤੂੰ ਮੇਰਾ,ਪਹਿਲਾਂ
ਕਰਨਾ ਪੈਣਾ ਇਹ ਇਕਰਾਰ ਤੈਨੂੰ...
(22ਦੀਸ਼ਾ)

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Tuesday, July 23, 2013

ਮਹਾਰਾਜਾ ਰਣਜੀਤ ਸਿੰਘ

ਮਹਾਰਾਜਾ ਰਣਜੀਤ ਸਿੰਘ
(13nov.1780-27june1839)
ਉਨ੍ਹਾ ਦੇ ਚਲਾਣੇ ਤੋਂ ਕਈ ਵਰ੍ਹੇ ਬਾਅਦ ਵੀ,ਉਸੇ ਸ਼ਾਂਤ,ਸੁਖੀ ਤੇ ਸੁਰੱਖਿਅਤ ਪੰਜਾਬ ਦੇ ਕੌਮੀ ਕਵੀ,ਸਯੱਦ ਸ਼ਾਹ ਮੁਹੰਮਦ (੧੭੮੨-੧੮੬੨) ਨੇ ਉਨ੍ਹਾ ਨੂੰ ਸ਼ਰਧਾਂਜਲੀ ਭੇਟ ਕਰਦਿਆਂ,ਇਹ ਖੁੱਲੇ-ਬੰਦ ਆਖਿਆ ਸੀ:
ਮਹਾਂਬਲੀ ਰਣਜੀਤ ਸਿੰਘ ਹੋਇਆ ਪੈਦਾ,
ਨਾਲ ਜ਼ੋਰ ਦੇ ਮੁਲਕ ਹਿਲਾਇ ਗਿਆ ।
ਮੁਲਤਾਨ,ਕਸ਼ਮੀਰ,ਪਸ਼ੌਰ,ਚੰਬਾ,
ਜੰਮੂ,ਕਾਂਗੜਾ,ਕੋਟ ਨਿਵਾਇ ਗਿਆ ।
ਹੋਰ ਦੇਸ਼ ਲਦਾਖ਼ ਤੇ ਚੀਨ ਤੋੜੀਂ,
ਸਿੱਕਾ ਆਪਣੇ ਨਾਮ ਚਲਾਇ ਗਿਆ ।
ਸ਼ਾਹ ਮੁਹੰਮਦਾ ਜਾਣ ਪਚਾਸ ਬਰਸਾਂ,
ਅੱਛਾ ਰੱਜ ਕੇ ਰਾਜ ਕਮਾਇ ਗਿਆ ।

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ਤਕਦੀਰ...

ਉਪਰੋਂ ਦੀ ਲੰਘ ਗਏ,ਮੁਹੱਬਤਾਂ ਦੇ ਕਾਫਲੇ ਥੱਲਿਓ ਦੀ ਨਦੀਆਂ ਦੇ ਨੀਰ
ਨਾਂ ਹਾਣੀਆਂ ਦੇ ਰਹੇ ਨਾਂ ਪਾਣੀਆਂ ਦੇ ਰਹੇ
ਪੁੱਲਾਂ ਜਿਹੀ ਸਾਡੀ ਤਕਦੀਰ...

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Sunday, July 21, 2013

ਰੰਜਨ ਆਤਮਜੀਤ ਦੀ ਇੱਕ ਰਚਨਾ

'ਰੰਜਨ ਆਤਮਜੀਤ ਦੀ ਇੱਕ ਰਚਨਾ'

ਸਾਜ਼ਿਸ਼ੀ ਹਵਾ ਨੂੰ ਅਾਖੋ ਕਿ ਕੁਝ ਸ਼ੱਕ ਹੈ ਤਾਂ ਮੇਰੇ ਪਰਾਂ ਨੂੰ ਪਰਖ ਲਵੇ,
ਪਹੁੰਚਣਾ ਤਾਂ ਮੈਂ ਜਰੂਰ ਹੈ ਚਾਹੇ ਮੰਜਿਲ ਕੁਝ ਹੋਰ ਪਰਾਂ ਸਰਕ ਲਵੇ ।
ਸਵੇਰ ਹੋਈ ਤਾਂ ਮੈਂ ਸੂਰਜ ਨੂੰ ਲੈ ਹੀ ਆਵਾਂਗਾ,ਪਰ ਪਹਿਲਾਂ,
ਇਸ ਨਗਰ ਦੇ ਹਨੇਰਿਆਂ 'ਚ ਕਿਸੇ ਸੱਸੀ ਦਾ ਮਹਿਰਮ ਗਰਕ ਲਵੇ ।
ਫਿਰ ਕੋਈ ਅੌਖੇ ਨਹੀਂ ਉਸ ਲਈ ਅਰਥ ਬਿਰਖਾਂ ਦੇ ਪਹਿਚਾਨਣੇ,
ਮਾਰੂਥਲ ਵਿੱਚ ਜੇ ਕੁਝ ਘੜੀਆਂ ਮੁਸਾਫਿਰ ਛਾਂ ਲਈ ਤਰਸ ਲਵੇ ।
ਕੁਝ ਆਸ ਸੀ ਪਿਆਰ ਦੇ ਖਤਾਂ ਤੇ ਮਹਿਬੂਬ ਦੇ ਰੁਮਾਲ ਨੂੰ,
ਕਿ ਸ਼ਾਇਦ ਭਲਕੇ ਉਹ ਵੀ ਇਕਾਂਤ ਲਈ ਕੱਢ ਕੁਝ ਵਕਤ ਲਵੇ ।
ਮੇਰੀ ਕੱਚੀ ਉਮਰ ਨੂੰ ਹੰਢਾਇਆ ਮਾਹੀ ਨੇ ਕੁਝ ਇਸ ਤਰਾਂ,
ਜਿਵੇਂ ਪੱਕੀ ਫਸਲ ਤੇ ਕੋਈ ਬੱਦਲ ਕਾਲਾ ਧਿੰਗਜ਼ੋਰੀ ਬਰਸ ਲਵੇ ।
ਕਰਨ ਕਿਸ ਕੋਲ ਫਰਿਆਦ ਆਖਿਰ ਇਹ ਵਿਚਾਰੀਆਂ ਤਿਤਲੀਆਂ,
ਜਦੋਂ ਕਾਗਜ਼ ਦੇ ਫੁੱਲਾਂ ਨੂੰ ਕੋਈ ਸਜ਼ਾ ਕੇ ਬਾਗਾਂ ਵਿੱਚ ਵਰਤ ਲਵੇ ।
ਆ ਉਦੋਂ ਤੱਕ ਕਰ ਦੇਈਏ ਸਭ ਉਮੰਗਾਂ ਤੇ ਖਾਹਿਸ਼ਾਂ ਨੂੰ ਮੁਲਤਵੀ,
ਜਦੋਂ ਤੱਕ ਯਾਰੀਆਂ ਲਾਉਣ ਦੀ ਉਮਰ ਇਸ ਨਗਰ ਚ ਨਾਂ ਪਰਤ ਲਵੇ ।
ਚਾਹੁੰਦੇ ਹੋ ਜੇ ਹਰ ਹਰਫ਼ ਨੂੰ ਮੇਰੇ ਸੀਨੇ ਦੇ ਪਾਰ ਕਰਨਾ,
ਤਾਂ ਗਜ਼ਲ ਨੂੰ ਆਖੋ ਕਿ ਹਿੱਸੇ ਆਪਣੇ ਦਾ ਇਹ ਮੰਗ ਕੇ ਦਰਦ ਲਵੇ ।

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Saturday, July 20, 2013

Nazm of Baba Nazmi

'ਅੱਖਰਾਂ ਵਿੱਚ ਸਮੁੰਦਰ ਰੱਖਾਂ,ਮੈਂ ੲਿਕਬਾਲ ਪੰਜਾਬੀ ਦਾ
ਝੱਖੜਾਂ ਦੇ ਵਿੱਚ ਰੱਖ ਦਿੱਤਾ ੲੇ,ਦੀਵਾ ਬਾਲ ਪੰਜਾਬੀ ਦਾ,
ਜਿਹੜੇ ਅਾਖਣ ਵਿੱਚ ਪੰਜਾਬੀ,ਵੁਸੱਤ ਨਹੀਂ ਤਹਿਜੀਬ ਨਹੀਂ
ਪੜਕੇ ਵੇਖਣ ਵਾਰਿਸ,ਬੁੱਲਾ,ਬਾਹੂ ਲਾਲ ਪੰਜਾਬੀ ਦਾ,
ਲੋਕੀਂ ਮੰਗ-ਮੰਗਾ ਕੇ ਅਾਪਣਾ,ਬੋਹਲ ਬਣਾ ਕੇ ਬਹਿ ਗੲੇ ਨੇ
ਅਸੀਂ ਤਾਂ ਮਿੱਟੀ ਕਰ ਦਿੱਤਾ ੲੇ,ਸੋਨਾ ਮਾਲ ਪੰਜਾਬੀ ਦਾ,
ਮਾਂ ਬੋਲੀ ਦੀ ਘਰ ਵਿੱਚ ੲਿੱਜਤ,ਕੰਮੀ ਜਿੰਨੀ ਵੇਖ ਰਿਹਾ
ਦੇਸ ਪਰਾੲੇ ਕੀ ਹੋਵੇਗਾ,ਖਬਰੈ ਹਾਲ ਪੰਜਾਬੀ ਦਾ ;
...................................
ਬਾਬਾ ਨਜ਼ਮੀ (ਪਾਕਿਸਤਾਨ)

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Wednesday, July 17, 2013

ये अजीबो-गरीब शौकीन व्यक्ति

बगदाद के खलीफा हारुन अल राशिद को दान देने का भूत सवार रहता था।वह प्रतिदिन घोडे पर सवार होकर शहर से गुजरता था और जो भी सामने पड जाता उसकी और चाँदी के सौ टुकडोँ से भरी थैली उछाल देता था।इस तरह 12वर्षोँ तक यही क्रम चलता रहने से वह कंगाल हो गया।
मिस्र के टकसाल के मालिक खलील घाहेटी ने अपने जीवन काल मेँ कई बार मक्का की यात्रा की।वह 800मील लम्बी यात्राओँ के दौरान मार्ग मेँ सोने की मोहरेँ बिछवाता था,ताकि उसका ऊँट प्रत्येक कदम सोने पर रखे।कारवां गुजर जाने के बाद राही उन सिक्कोँ को उठा लेते थे।उसका कोष इसी तरह समाप्त हो गया।
हैदराबाद के छठे निज़ाम मीर महबूब अली को प्रतिदिन नई पोशाक पहनने का शौक था।
मंगोलिया के शेख शाहरुख ने अपने 43 जन्मदिन अनोखे ढंग से मनाये।उसके जन्मदिन पर जो भी उसके दरवाजे पर आता उसे हीरे-मोती-पन्नोँ से भरा थाल दिया जाता था,43 वर्षोँ तक ये परम्परा चलते रहने से उसका कोष समाप्त हो गया।
स्पेन के अधिकृत गायना(अफ्रीका)मे एक सम्राट व्यूविस्त्र को हर रोज मूल्यवान सिंहासन पर बैठने का शौक था और एक बार बैठने के बाद वो उसे नदी मेँ प्रवाहित करवा देता था।
(मंथन)प्रस्तुति:जनकराम साहू

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Tuesday, July 16, 2013

कुसूर-ऐ-नज़र

कुछ तो तेरी नज़र का
कुसूर था जरुर,ऍ साकी,
डोल गये जो कदम,वर्ना
महफिलेँ तो रोज़ की बात हैँ...;

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Tuesday, July 2, 2013

'अविष्कार पेनिसिलिन का'

कई बार अचानक घटित हुई घटना,और उससे उजागर रहस्य,जिसके लिए कोई विशेष प्रयास न किया गया हो,मनुष्य जाति के लिए वरदान साबित हो जाता हैँ।
ऐसी ही एक घटना 28सतंबर1928 को लंदन के सेँट मेरी हास्पिटल मेँ घटी।अपनी लापरवाही से मजबूर एलैक्जेँडर ने जब कई दिनोँ की छुट्टी के बाद आकर लैब मेँ देखा कि जिस तश्तरी(Petrydish)मेँ फोडोँ की मवाद का नमूना खुला रख के भूल गये थे,उसमेँ फफूँद उग आई थी।उस तश्तरी को साफ करने से पहले जब माइक्रोस्कोप की मदद से देखा तो हैरान करने वाला तथ्य सामने आया कि जहाँ जहाँ फफूँद पनपी थी वहाँ बैक्टीरिया मर चुके थे।
तरीके से प्रयोग करने पर पाया कि फफूँद पेनिसिलियम नोटाडम थी,जिसमेँ संक्रामक रोग फैलाने वाले बैक्टीरिया को नष्ट करने की क्षमता थी।तो,उन्ही फफूँदो से जो दवा बनी,उसे हम 'पेनिसिलिन'कहते हैं।
इस दवा के खोजकर्ता 'सर एलैक्जेँडर फ्लेमिंग'(जीववैज्ञानिक और औषधिनिर्माता)थे,जिनहे उनकी इस खोज के लिए सन1945 मेँ संयुक्त रुप से नोबेल पुरस्कार दिया गया।6अग्सत1881 को जनमेँ इस महान वैज्ञानिक का 74 वर्ष की उम्र मेँ लंदन स्थित उन्के घर मेँ हार्ट अटैक की वचह से 11मार्च1955 को निधन हो गया।

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Sunday, June 30, 2013

खोज 'एक्स-रे' की

एक्स-रे की खोज 'विल्हेम कानरैड रांटजन'(27मार्च1845-10फरवरी1923) ने सन1895 मेँ की थी।
उन्होने इसके लिए विशेष प्रयास नहीँ किया था।वह एक दिन सामानय ढंग से काँच की नली के दोनोँ छोरोँ को तारोँ से जोड कर विद्युत परिपथ पैदा कर रहे थे।इसी दौरान एक घटना घटी।रांटजन के नली को काले कपडे से लपेटने के बावजूद मेज पर हरे रंग की तरंगे झिलमिला रही थीँ।तब आश्चर्य का ठिकाना न रहा,जब देखा गया कि हरे रंग की ये तरंगेँ अपारदर्शक पदार्थोँ को भेद जाती है।इस घटना का प्रायोगिक अध्ययन करने के बाद रांटजन ने इन्हे 'एक्सरेज़' अर्थात 'अज्ञात किरणेँ' का नाम दिया।किन्तु जर्मनी मेँ उनके सम्मान मेँ इनहेँ 'रांटजन किरणेँ' ही कहा जाता है।
'विल्हेम कानरैड रांटजन'(रांटजन क्रुकस)ने जब ये खोज की तब वो जर्मनी के वुटर्सबर्ग विश्वविद्यालय मेँ भौतिकी के प्राध्यापक थे।इस महान खोज के लिए उन्हे सन1909 मेँ भौतिकी मेँ नोबेल पुरस्कार भी दिया गया।
(कुछ अंश बाल केसरी,20अगस्त2011 से लिए गये हैँ)

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Monday, June 17, 2013

'विचार'

एक सुचारु रुप से शासित देश मेँ गरीबी पर हमेँ शर्म करनी चाहिए और विषम रुप से शासित देश मेँ अमीर होने पर शर्म करनी चाहिए ।
कन्फयूशियस (प्रसिद्ध दार्शनिक)

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Tuesday, June 4, 2013

वो लोग जो न भूल पायेँगेँ... !

आज मैँ अपने मनपसंद अदाकार देव आनंद साहिब की एक फिल्म 'जौनी मेरा नाम' टीवी पे देख रहा था ।तो एकाएक मेरा ध्यान पुलिस कमिश्नर का रोल अदा कर रहे अदाकार 'इफ्तिखार खान साहिब' पर ही टिककर रह गया,हालांकि मैँ बैठा देव साहब के लिए ही था ।पर,ऐसे ही ख्याल खान साहिब के इर्द गिर्द ही घूमता रहा,और सोचता रहा कि क्या लाजवाब कलाकार थे वो ।उन्हे किसी भी फिल्म मेँ देखा,तो कभी लगा नहीँ कि वो एक्टिँग कर रहे होँ,उनकी अदाकारी इतनी स्वभाविक लगती थी ।एक और बात,जब भी देखा उन्हे,वो हमेँ एक ही तरह के नज़र आये,वही सिहत,वही आवाज़ ।
कमाल की डायलाग डल्विरी,बेहतरीन कलाकार थे,जितना भी उनका रोल फिल्म मेँ हो,आप उनका काम भूल नहीँ पाते।ज्यादातर हमनेँ उन्हे पुलिस की वर्दी मेँ ही देखा।
इफ्तिखार खान साहिब का जन्म सिआलकोट(पाकिस्तान)का था।22 फरवरी 1920 को जन्मे इस महान अदाकार ने करीब 400 फिल्मोँ मेँ अभिनय किया,जिनमेँ 1 अमेरिकन सीरियल के अलावा,2 अंग्रेज़ी फिल्मेँ Bombay Talkie(70)और city of joy(92) भी थीँ।17साल की उम्र से शुरु उनका फिल्मीँ सफर यादगार रहा,और 4 मार्च 1995 को 75 साल की उम्र मेँ वो इस दुनिया को अलविदा कह गये।

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Sunday, June 2, 2013

( फांसी पर चढ़ने से पूर्व मदन लाल ढीँगरा का वक्तव्य )

मेरा यकीन है कि एक राष्ट्र जिसे विदेशी छुरी की नोक पर झुकाया गया है,वह निरंतर युद्ध की स्थिती मेँ है ।चूंकि खुला युद्ध,निहत्थी प्रजाति के लिए असंभव बना दिया गया है,इसलिए मैनेँ अचानक से हमला किया । चूंकि मुझे बंदूकोँ से वंचित कर दिया गया तो मैनेँ अपनी पिस्तौल निकाली और गोली चलाई ।धन-संपदा से गरीब,लेकिन मस्तिष्क से बुद्धिमान,मेरे जैसे बेटे के पास माँ को देने के लिए कुछ नहीँ है,अपने खून के अलावा,इसलिए मैनेँ उसकी वेदी पर अपने खून का बलिदान दे दिया है ।एकमात्र सबक जिसकी जरुरत वर्तमान मेँ भारत को है,वह है यह सीखना कि कैसे मृत्यृ को प्राप्त हुआ जाए और इसे सिखाने का एकमात्र तरीका है कि हम खुद मृत्यृ को प्राप्त होँ ।मेरी ईश्वर से एक ही प्रार्थना है कि उसी माँ के पास मेरा पुनर्जन्म हो और मैँ इसी पवित्र प्रयोजन के लिए फिर से मरुँ तब तक,जब तक कि प्रयोजन सफल न हो जाए ।
वंदे मातरम ।

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वतन

'अपने वतन को प्रेम करो,वतन जो जगह है,जहां तुम्हारे अभिभावक सोए हैँ,जहाँ तुमने वह भाषा बोली है,जो कि तुम्हारे दिल ने चुनी थी,जहाँ शरमाते हुए तुमने 'प्यार' का पहला शब्द कहा था ।यह वह घर है,जो खुदा ने तुम्हे दिया है,जिसमेँ तुम खुद को मुकम्मल बनाने के प्रयास करते रहो !'
गुसेपी मजीनी (इतालवी क्रांतिकारी)

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Thursday, May 30, 2013

कौन आया है यहाँ
कोई न आया होगा,
मेरा दरवाजा हवाओँ ने हिलाया होगा,
गुल से लिपटी हुई तितलीयोँ को
गिराओ तो जानेँ,
आँधियोँ ! तुमने दरख्तोँ को गिराया होगा...।

Wednesday, May 29, 2013

लक्ष्य साधो,तभी मिलेगी सफलता

किसी एक विचार को अपने जीवन का लक्षय बनाओ।कुविचारोँ का त्याग कर केवल उसी विचार के बारे मेँ सोचो।तुम पाओगे कि सफलता तुम्हारे कदम चूम रही है।
-स्वामी विवेकानंद

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Sunday, May 26, 2013

हमारी भूल

मुझे राजनीती की ज्यादा समझ तो नहीँ है,लेकिन इस विष्य पर बात करते कई लोगोँ को सुना है,और अब तो इस बारे मेँ मैँ अपनी भी एक राय रखने लगा हुँ ।अपनी समझ के मुताबिक जितना समझ पाया,वो ये कि ये क्षेत्र उन लोगोँ के लिए तो बिल्कुल ही नहीँ है जो अपना जीवन अपने आदर्शोँ के मुताबिक जीना चाहते होँ और समाज मेँ उन्ही उसूलोँ के सहारे कोई ठोस परिवर्तन लाना चाहते होँ।
राजनीती मेँ कोई भी व्यक्ति जो लोगोँ की आवाज बन कर आगे आता है,या तो सोच समझ कर बनाई रणनीती के द्वारा वो अपने भविष्य को अधिक प्राथमिकता देते हुए लोगोँ के हितोँ की रक्षा के साथ समझोता कर लेता है और हाथ मिला लेता है राजनीती के उन दलालोँ से जो जनता के हितोँ को दबाने का धंधा करते हैँ अपने उपर बैठे आकाओँ को खुश रखने मेँ हर प्रकार से सक्रिय रहते हैँ।

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Friday, May 24, 2013

इशक

मैनेँ अपनी जिँदगी मे
प्यार कभी नहीँ किया था,
मैँ मरा नहीँ परवानोँ की तरह कभी
प्यार जिँदगी से किया था,
क्योँ कि कभी देखा नहीँ
किसी ने प्यार से मेरी तरफ,
इसलिए अहसास प्यार का
हुआ ही नहीँ था,
लेकिन एक दिन खुदा की रहमत हुई
एक हसीना से आँखे चार हुई,
जबरदस्ती दिल मेँ मेरे उमंग जागी
वर्षो से सोई भूतनी इश्क की फिर जागी,
आगे तो मैँ गली मेँ खडना आवारगी समझता था
लेकिन दो चार दिन बीते
मैँ एक आध घंटा चौक मेँ खडा करता था,
उस लडकी से दोबारा मुलाकात हुई
मिलना जुलना फिर इकरार
सच्च मानोँ तो हमारे बीच
जल्द ही कोई दीवार न रही,
घुल मिल गये थोडे दिनोँ मेँ ऐसे
हो प्यार जन्मोँ से हमारा जैसे,
ऐसी गजब प्यार की कायम मिसाल हुई,
न रह सकते थे मिले बगैर एक दिन भी
याद मे उनकी लगी रहती थी एक अगन सी,
कभी होटल,कभी सिनेमा
कभी लेकर जाता क्लबोँ मेँ उसे
भले ही हाल मेरा बिल्कुल था,
लगभग एक महिना रही वो करती ऍश
कभी खाना पीना,कभी घूमना फिरना
कभी तो माँग भी लेती थी कैश,
घर वालोँ की तरफ से पैसोँ के लिए जवाब था
लेकर जाता लेकिन कहीँ से भी मैँ पैसे
यारो !सामने माशूक के तो मैँ नवाब था ।
खैर,अब मेरा इश्क कुछ ठंडा पड रहा था
होले होले सर पे कर्ज भी बहुत चढ गया था,
एक दिन मैनेँ बात सारी उसको बताई
भई उसने भी बहुत हमदर्दी जताई,
उस समय अहसास मुझे कुछ अपनोँ सा हुआ
चलो किसी ने तो जानी इस दिल की हाये दुहाई,
अब बहुत दिन बीते हमेँ मिले हुए
न गया मै उसके पास,न वो आई
मंदे इशक के कुछ हालात हुऐ,
एक दिन मैँ अपनी हीरो साईकल के साथ
जिसकी हालत कुछ ख्सता थी
साईकल वाले की दुकान पे खडा था
फटे टायर की बदौलत
एक बडा पटाखा टयूब मेँ पडा था,
तभी एक नई मोटरसाईकल
दो सवारीयोँ के साथ
आँधी की तरह मेरे पास से गुजरी
मैने मुँह मे ही उसे कुछ बुरा भला कहा
'तभी दिखाई पडा कुछ साफ यारो'
धूल मिट्टी की कुछ हटती जा रही थी
जो माशूक कल थी मेरी जिँदगी
वो आज नई मोटरसाईकल पे
किसी और के संग चली जा रही थी,
वो तो शायद इन बातोँ की आदी थी
लेकिन मेरा दिल बहुत रोया
ऐसा हुआ था मैँ इश्क मे अँधा
कि मैने अपना आप खोया था
टूटे दिल ने एक आवाज दी
कि बेदर्दी !मैँ तो तेरी
बेवफाई सह गया,
किसी और को धोखा मत देना
वो शायद नहीँ सहेगा,
काँटा तेरे प्यार का जिँदगी भर
दिल मेँ मेरे चुभता रहेगा
दिल मेँ ....,
(ये कविता करीब 16-17 साल पहले मैनेँ लिखी होगी,समझ कम थी पर जुनून
था,जैसी भी लिखी थी,वैसी ही आपकी नजर की है)

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Jagdish disha

Thursday, May 23, 2013

शायर ''कतील शिफाई''

हालात के कदमोँ पे कलंदर नहीँ गिरता
टूटे भी जो तारा,वो जमीँ पर नहीँ गिरता,
गिरते है बडे शौक से समंद्र मे दरिया
लेकिन किसी दरिया मेँ समंद्र नहीँ गिरता,
समझो वहां फलदार सज़र कोई नहीँ
वो सहन के जिस्म पे कोई पत्थर नहीँ गिरता,
इतना तो हुआ फायदा बारिश की कमी से
इस शहर मेँ अब कोई फिसल कर नहीँ गिरता,
हैरान है कई रोज से ठहरा हुआ पानी
तालाब मेँ अब क्योँ कोई कंकर नहीँ गिरता;

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वाह शाद !वाह....

कुछ तुझसे गिला कातब-ऐ-तकदीर नहीँ है
मिटती न हो ऐसी,कोई तहरीर नहीँ है,
इनाम है मेहनत का,या यह हासिल-ए-गम है
सुख चैन किसी एक की जागीर नहीँ है,
कुदरत का भी कुछ हाथ है बंदे की ख्ता मेँ
यह सब की सब इन्सान की तकसीर नहीँ है,
दिल मायल-ऐ-परवाज नहीँ मुरग-ऐ-कफस का
क्या गम है,अगर आह मेँ तासीर नहीँ है,
हालात की तस्वीर कहो शाद का शेय्र
चूके जो निशाने से,ये वो तीर नहीँ है;

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कुछ "आबिद अरमान" की कलम से

दुनियाँ का हर एक शौक पाला नहीँ जाता,
शीशे के खिलौनो को उछाला नहीँ जाता,
मेहनत से,दुआओँ से निकल जाती हैँ राहेँ
हर काम को तकदीर पे टाला नहीँ जाता,
दामन को बचाते हैँ सभी साहब ऐ किरदार
खारोँ को भी गुलशन से निकाला नहीँ जाता,
कोशिश न तु कर,ज़र से छुपाना भी है मुशकिल
पर्दा कभी हर ऐब पे डाला नहीँ जाता,
ये बात अलग है कि गल घोँट के जी लेँ
'अरमान' कोई दिल से निकाला नहीँ जाता;

--
Jagdish disha

Wednesday, May 22, 2013

ज्ञान गंगा

1, जब मैँ 5 वर्ष का था तब मैँ सोचता था कि मेरे पिता दुनियाँ के सबसे
ताकतवर और समझदार व्यक्ति हैँ ।
2, जब मैँ 10 वर्ष का हुआ तब मैनेँ महसूस किया कि मेरे पिता को दुनियाँ
की हर चीज़ के बारे मेँ ज्ञान है ।
3, जब 15 वर्ष का हुआ तब मैनेँ महसूस किया कि मेरे पिता को दुनियाँ के
साथ चलने के लिए कुछ और ज्ञान की जरुरत है ।
4, जब 20 का हुआ तब महसूस किया कि पिता जी तो किसी और ही दुनियाँ के हैँ
और वे हमारी सोच के साथ नहीँ चल सकते ।
5, और 25 का हुआ तो महसूस हुआ कि पिता जी से किसी भी काम मेँ सलाह लेने
की जरुरत नहीँ है क्योँकि उन्हे हर काम मेँ कमी निकालने की आदत पड गयी है

6, जब 30 का हुआ तो महसूस करने लगा कि मेरे पिता को मेरी नक्ल से कुछ-कुछ
समझ आने लगी है ।
7, जब 35 का हुआ तब महसूस करने लगा कि अब उनसे छोटे मोटे फैसलोँ पर सलाह
ली जा सकती है ।
8, जब 40 वर्ष का हुआ तो मैने महसूस किया कि हर तरह के मामले मेँ पिता जी
की सलाह ली जा सकती है ।
9, जब मैँ 50 वर्ष का हुआ तब मैनेँ फैसला किया कि मुझे अपने पिता जी की
सलाह के बिना कुछ नहीँ करना चाहिए क्योँकि मुझे ये ज्ञान हो चुका था कि
मेरे पिता जी दुनियाँ के सबसे समझदार व्यक्ति है,पर....
मैँ अपने इस फैसले पर अमल कर पाता,इस से पहले ही पिता जी इस संसार को
अलविदा कह गऐ और मैँ अपने पिता जी की हर सलाह और तजुर्बे से वंचित रह
गया....!

Jagdish disha

Sunday, May 19, 2013

एक नज़म अंजुम साहिब की

मसीहा हो गये कुर्बान,लेकिन तुम नहीँ समझे
मुहब्बत उनका था अरमान,लेकिन तुम नहीँ समझे...
बदन पे इतने कोडे और सलीबी खून हाथोँ पर
यह कुर्बानी नहीँ आसान,लेकिन तुम नहीँ ...
जब उसने जान दे दी और कहा ''अब सुरखरु तुम हो''
गुनाहोँ मेँ घिरा शैतान,लेकिन तुम नहीँ ...
सलीब अपनी उठाये फिर हमारे साथ तुम निकलो
तुम्हारी दुश्मनी बेजान,लेकिन तुम नहीँ ..
मज़हब की गुलामी कब,मुझे मंजूर थी 'अंजुम'
मैँ आजादी का था फरमान,लेकिन तुम नहीँ समझे ;

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Saturday, May 18, 2013

बातेँ काम की

तुँ कुछ नहीँ,यहाँ क्या है तेरा,
समझ ले गर,बात इतनी तो,
कदम 'दिश्शे' खुदा के घर को,
बढा जान ले आज अभी से;
ये बात इतने ऋषि-मुनी,पीर-पैगंबर,संत साधु दरवेश लोग कई तरीकोँ से कह गये,बार-बार समझाने के पश्चात भी हम मे से कितने ऐसे लोग होँगेँ,जो समझ पाये और जो चल पाये उस रास्ते पे जो खुदा के घर जाता है ।
बहुत फर्क है कोई बात सिर्फ सुनने और समझने मेँ।हम ऐसी बातेँ बडे ध्यान से सुन तो जरुर लेते हैँ,लेकिन,उन्हे अपने जीवन मेँ ढाल नहीँ पाते।
क्या हमे थोडा सा वक्त उस भगवान का नाम लेने के लिए नहीँ निकालना चाहिए जिनकी कृपा से हम जीवन मेँ सभी सुख संसाधनो का उपयोग कर रहे हैँ,आनंद ले रहे है उसकी बनाई हर एक वस्तु का,जो कभी भी हमारी नहीँ थी,मगर, फिर भी उसने हमेँ बख्श दीँ।
ये बात हमे नहीँ भूलनी चाहिये कि इस शरीर मेँ जो आत्मा है,उसका ये पक्का ठिकाना नहीँ है अगर प्रभु ने हमेँ मौका दिया है,कि हम उसको खोज सकेँ और अपनी आत्मा को परमात्मा से मिला सकेँ तो हमेँ इस मौके का सही फायदा लेने की भरपूर कोशिश करनी चाहिए ।

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Thursday, May 16, 2013

है कोई दोस्त,आपका भी ?

आप मैँ या कोई भी इन्सान ऐसा नहीँ जिसे जिंदगी मेँ किसी मुसिबत का सामना न करना पडा हो ।मुसिबत चाहे कैसी भी हो,अपनी खुद की सिहत से जुडी,कारोबार से सबंधित याँ घरेलू प्रकार की कोई परेशानी।
जब भी ऐसी किसी वजह से मन परेशान होता है तो सबसे ज्यादा जो सहारा व होँसला किसी दोस्त मित्र के साथ की बात से मिल सकता है,वैसा किसी सगे सबंधी के पास होने से भी महसूस नहीँ होता।
वजह ये कि दोस्त हमारी खुशी व तकलीफोँ से सीधे जुडे होते हैँ क्योँ कि हम उनसे अपने सबंधियोँ की तुलना मेँ निरंतर बातचीत के द्वारा गहराई से जुडे रहते हैँ और उनका रोल ज्यादा अहम बना रहता है इसलिए भी कि बहुत सी निजी बातेँ हर कोई अपने दोस्तोँ से ही शेयर करके सुरक्षित महसूस करता है।
इसलिए दोस्ती के इस रिश्ते को सदा मधुर बनायेँ रखेँ।
भाई बहन,सबंधी हमे भगवान से बिन मांगे मिलते हैँ,मगर दोस्त हम अपनी मर्जी से चुनते हैँ,जो दिल से अच्छा हो,आपके विचारोँ की कद्र करे और आपके जज्बात को समझता हो।
इसलिए आदर्श दोस्तोँ का साथ निभायेँ,खुद भी आदर्श मित्र बनेँ।
'युँ तो सब हैँ,रिश्ते जहाँ मे,
रिश्ता दोस्ती का,ऐ खुदा !
इन्सान को बख्शी तेरी
है सबसे अच्छी सौगात';

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Sunday, May 12, 2013

देखो तो सही

निगाहोँ से निगाहोँ मिलाकर तो देखो
नये लोगोँ से रिशता बनाकर तो देखो
जो है दिल मेँ उसे जता कर तो देखो
खुद को इक बार आजमा कर तो देखो
आसमाँ भी सिमट जायेगा आपके आगोश मेँ
चाहत की बाहेँ,फैला कर तो देखो
दिल की बात बता कर तो देखो ....;

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Life mantras