कौन आया है यहाँ
कोई न आया होगा,
मेरा दरवाजा हवाओँ ने हिलाया होगा,
गुल से लिपटी हुई तितलीयोँ को
गिराओ तो जानेँ,
आँधियोँ ! तुमने दरख्तोँ को गिराया होगा...।
Thursday, May 30, 2013
Wednesday, May 29, 2013
लक्ष्य साधो,तभी मिलेगी सफलता
किसी एक विचार को अपने जीवन का लक्षय बनाओ।कुविचारोँ का त्याग कर केवल उसी विचार के बारे मेँ सोचो।तुम पाओगे कि सफलता तुम्हारे कदम चूम रही है।
-स्वामी विवेकानंद
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-स्वामी विवेकानंद
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Sunday, May 26, 2013
हमारी भूल
मुझे राजनीती की ज्यादा समझ तो नहीँ है,लेकिन इस विष्य पर बात करते कई लोगोँ को सुना है,और अब तो इस बारे मेँ मैँ अपनी भी एक राय रखने लगा हुँ ।अपनी समझ के मुताबिक जितना समझ पाया,वो ये कि ये क्षेत्र उन लोगोँ के लिए तो बिल्कुल ही नहीँ है जो अपना जीवन अपने आदर्शोँ के मुताबिक जीना चाहते होँ और समाज मेँ उन्ही उसूलोँ के सहारे कोई ठोस परिवर्तन लाना चाहते होँ।
राजनीती मेँ कोई भी व्यक्ति जो लोगोँ की आवाज बन कर आगे आता है,या तो सोच समझ कर बनाई रणनीती के द्वारा वो अपने भविष्य को अधिक प्राथमिकता देते हुए लोगोँ के हितोँ की रक्षा के साथ समझोता कर लेता है और हाथ मिला लेता है राजनीती के उन दलालोँ से जो जनता के हितोँ को दबाने का धंधा करते हैँ अपने उपर बैठे आकाओँ को खुश रखने मेँ हर प्रकार से सक्रिय रहते हैँ।
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राजनीती मेँ कोई भी व्यक्ति जो लोगोँ की आवाज बन कर आगे आता है,या तो सोच समझ कर बनाई रणनीती के द्वारा वो अपने भविष्य को अधिक प्राथमिकता देते हुए लोगोँ के हितोँ की रक्षा के साथ समझोता कर लेता है और हाथ मिला लेता है राजनीती के उन दलालोँ से जो जनता के हितोँ को दबाने का धंधा करते हैँ अपने उपर बैठे आकाओँ को खुश रखने मेँ हर प्रकार से सक्रिय रहते हैँ।
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Friday, May 24, 2013
इशक
मैनेँ अपनी जिँदगी मे
प्यार कभी नहीँ किया था,
मैँ मरा नहीँ परवानोँ की तरह कभी
प्यार जिँदगी से किया था,
क्योँ कि कभी देखा नहीँ
किसी ने प्यार से मेरी तरफ,
इसलिए अहसास प्यार का
हुआ ही नहीँ था,
लेकिन एक दिन खुदा की रहमत हुई
एक हसीना से आँखे चार हुई,
जबरदस्ती दिल मेँ मेरे उमंग जागी
वर्षो से सोई भूतनी इश्क की फिर जागी,
आगे तो मैँ गली मेँ खडना आवारगी समझता था
लेकिन दो चार दिन बीते
मैँ एक आध घंटा चौक मेँ खडा करता था,
उस लडकी से दोबारा मुलाकात हुई
मिलना जुलना फिर इकरार
सच्च मानोँ तो हमारे बीच
जल्द ही कोई दीवार न रही,
घुल मिल गये थोडे दिनोँ मेँ ऐसे
हो प्यार जन्मोँ से हमारा जैसे,
ऐसी गजब प्यार की कायम मिसाल हुई,
न रह सकते थे मिले बगैर एक दिन भी
याद मे उनकी लगी रहती थी एक अगन सी,
कभी होटल,कभी सिनेमा
कभी लेकर जाता क्लबोँ मेँ उसे
भले ही हाल मेरा बिल्कुल था,
लगभग एक महिना रही वो करती ऍश
कभी खाना पीना,कभी घूमना फिरना
कभी तो माँग भी लेती थी कैश,
घर वालोँ की तरफ से पैसोँ के लिए जवाब था
लेकर जाता लेकिन कहीँ से भी मैँ पैसे
यारो !सामने माशूक के तो मैँ नवाब था ।
खैर,अब मेरा इश्क कुछ ठंडा पड रहा था
होले होले सर पे कर्ज भी बहुत चढ गया था,
एक दिन मैनेँ बात सारी उसको बताई
भई उसने भी बहुत हमदर्दी जताई,
उस समय अहसास मुझे कुछ अपनोँ सा हुआ
चलो किसी ने तो जानी इस दिल की हाये दुहाई,
अब बहुत दिन बीते हमेँ मिले हुए
न गया मै उसके पास,न वो आई
मंदे इशक के कुछ हालात हुऐ,
एक दिन मैँ अपनी हीरो साईकल के साथ
जिसकी हालत कुछ ख्सता थी
साईकल वाले की दुकान पे खडा था
फटे टायर की बदौलत
एक बडा पटाखा टयूब मेँ पडा था,
तभी एक नई मोटरसाईकल
दो सवारीयोँ के साथ
आँधी की तरह मेरे पास से गुजरी
मैने मुँह मे ही उसे कुछ बुरा भला कहा
'तभी दिखाई पडा कुछ साफ यारो'
धूल मिट्टी की कुछ हटती जा रही थी
जो माशूक कल थी मेरी जिँदगी
वो आज नई मोटरसाईकल पे
किसी और के संग चली जा रही थी,
वो तो शायद इन बातोँ की आदी थी
लेकिन मेरा दिल बहुत रोया
ऐसा हुआ था मैँ इश्क मे अँधा
कि मैने अपना आप खोया था
टूटे दिल ने एक आवाज दी
कि बेदर्दी !मैँ तो तेरी
बेवफाई सह गया,
किसी और को धोखा मत देना
वो शायद नहीँ सहेगा,
काँटा तेरे प्यार का जिँदगी भर
दिल मेँ मेरे चुभता रहेगा
दिल मेँ ....,
(ये कविता करीब 16-17 साल पहले मैनेँ लिखी होगी,समझ कम थी पर जुनून
था,जैसी भी लिखी थी,वैसी ही आपकी नजर की है)
--
Jagdish disha
प्यार कभी नहीँ किया था,
मैँ मरा नहीँ परवानोँ की तरह कभी
प्यार जिँदगी से किया था,
क्योँ कि कभी देखा नहीँ
किसी ने प्यार से मेरी तरफ,
इसलिए अहसास प्यार का
हुआ ही नहीँ था,
लेकिन एक दिन खुदा की रहमत हुई
एक हसीना से आँखे चार हुई,
जबरदस्ती दिल मेँ मेरे उमंग जागी
वर्षो से सोई भूतनी इश्क की फिर जागी,
आगे तो मैँ गली मेँ खडना आवारगी समझता था
लेकिन दो चार दिन बीते
मैँ एक आध घंटा चौक मेँ खडा करता था,
उस लडकी से दोबारा मुलाकात हुई
मिलना जुलना फिर इकरार
सच्च मानोँ तो हमारे बीच
जल्द ही कोई दीवार न रही,
घुल मिल गये थोडे दिनोँ मेँ ऐसे
हो प्यार जन्मोँ से हमारा जैसे,
ऐसी गजब प्यार की कायम मिसाल हुई,
न रह सकते थे मिले बगैर एक दिन भी
याद मे उनकी लगी रहती थी एक अगन सी,
कभी होटल,कभी सिनेमा
कभी लेकर जाता क्लबोँ मेँ उसे
भले ही हाल मेरा बिल्कुल था,
लगभग एक महिना रही वो करती ऍश
कभी खाना पीना,कभी घूमना फिरना
कभी तो माँग भी लेती थी कैश,
घर वालोँ की तरफ से पैसोँ के लिए जवाब था
लेकर जाता लेकिन कहीँ से भी मैँ पैसे
यारो !सामने माशूक के तो मैँ नवाब था ।
खैर,अब मेरा इश्क कुछ ठंडा पड रहा था
होले होले सर पे कर्ज भी बहुत चढ गया था,
एक दिन मैनेँ बात सारी उसको बताई
भई उसने भी बहुत हमदर्दी जताई,
उस समय अहसास मुझे कुछ अपनोँ सा हुआ
चलो किसी ने तो जानी इस दिल की हाये दुहाई,
अब बहुत दिन बीते हमेँ मिले हुए
न गया मै उसके पास,न वो आई
मंदे इशक के कुछ हालात हुऐ,
एक दिन मैँ अपनी हीरो साईकल के साथ
जिसकी हालत कुछ ख्सता थी
साईकल वाले की दुकान पे खडा था
फटे टायर की बदौलत
एक बडा पटाखा टयूब मेँ पडा था,
तभी एक नई मोटरसाईकल
दो सवारीयोँ के साथ
आँधी की तरह मेरे पास से गुजरी
मैने मुँह मे ही उसे कुछ बुरा भला कहा
'तभी दिखाई पडा कुछ साफ यारो'
धूल मिट्टी की कुछ हटती जा रही थी
जो माशूक कल थी मेरी जिँदगी
वो आज नई मोटरसाईकल पे
किसी और के संग चली जा रही थी,
वो तो शायद इन बातोँ की आदी थी
लेकिन मेरा दिल बहुत रोया
ऐसा हुआ था मैँ इश्क मे अँधा
कि मैने अपना आप खोया था
टूटे दिल ने एक आवाज दी
कि बेदर्दी !मैँ तो तेरी
बेवफाई सह गया,
किसी और को धोखा मत देना
वो शायद नहीँ सहेगा,
काँटा तेरे प्यार का जिँदगी भर
दिल मेँ मेरे चुभता रहेगा
दिल मेँ ....,
(ये कविता करीब 16-17 साल पहले मैनेँ लिखी होगी,समझ कम थी पर जुनून
था,जैसी भी लिखी थी,वैसी ही आपकी नजर की है)
--
Jagdish disha
Thursday, May 23, 2013
शायर ''कतील शिफाई''
हालात के कदमोँ पे कलंदर नहीँ गिरता
टूटे भी जो तारा,वो जमीँ पर नहीँ गिरता,
गिरते है बडे शौक से समंद्र मे दरिया
लेकिन किसी दरिया मेँ समंद्र नहीँ गिरता,
समझो वहां फलदार सज़र कोई नहीँ
वो सहन के जिस्म पे कोई पत्थर नहीँ गिरता,
इतना तो हुआ फायदा बारिश की कमी से
इस शहर मेँ अब कोई फिसल कर नहीँ गिरता,
हैरान है कई रोज से ठहरा हुआ पानी
तालाब मेँ अब क्योँ कोई कंकर नहीँ गिरता;
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टूटे भी जो तारा,वो जमीँ पर नहीँ गिरता,
गिरते है बडे शौक से समंद्र मे दरिया
लेकिन किसी दरिया मेँ समंद्र नहीँ गिरता,
समझो वहां फलदार सज़र कोई नहीँ
वो सहन के जिस्म पे कोई पत्थर नहीँ गिरता,
इतना तो हुआ फायदा बारिश की कमी से
इस शहर मेँ अब कोई फिसल कर नहीँ गिरता,
हैरान है कई रोज से ठहरा हुआ पानी
तालाब मेँ अब क्योँ कोई कंकर नहीँ गिरता;
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वाह शाद !वाह....
कुछ तुझसे गिला कातब-ऐ-तकदीर नहीँ है
मिटती न हो ऐसी,कोई तहरीर नहीँ है,
इनाम है मेहनत का,या यह हासिल-ए-गम है
सुख चैन किसी एक की जागीर नहीँ है,
कुदरत का भी कुछ हाथ है बंदे की ख्ता मेँ
यह सब की सब इन्सान की तकसीर नहीँ है,
दिल मायल-ऐ-परवाज नहीँ मुरग-ऐ-कफस का
क्या गम है,अगर आह मेँ तासीर नहीँ है,
हालात की तस्वीर कहो शाद का शेय्र
चूके जो निशाने से,ये वो तीर नहीँ है;
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मिटती न हो ऐसी,कोई तहरीर नहीँ है,
इनाम है मेहनत का,या यह हासिल-ए-गम है
सुख चैन किसी एक की जागीर नहीँ है,
कुदरत का भी कुछ हाथ है बंदे की ख्ता मेँ
यह सब की सब इन्सान की तकसीर नहीँ है,
दिल मायल-ऐ-परवाज नहीँ मुरग-ऐ-कफस का
क्या गम है,अगर आह मेँ तासीर नहीँ है,
हालात की तस्वीर कहो शाद का शेय्र
चूके जो निशाने से,ये वो तीर नहीँ है;
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कुछ "आबिद अरमान" की कलम से
दुनियाँ का हर एक शौक पाला नहीँ जाता,
शीशे के खिलौनो को उछाला नहीँ जाता,
मेहनत से,दुआओँ से निकल जाती हैँ राहेँ
हर काम को तकदीर पे टाला नहीँ जाता,
दामन को बचाते हैँ सभी साहब ऐ किरदार
खारोँ को भी गुलशन से निकाला नहीँ जाता,
कोशिश न तु कर,ज़र से छुपाना भी है मुशकिल
पर्दा कभी हर ऐब पे डाला नहीँ जाता,
ये बात अलग है कि गल घोँट के जी लेँ
'अरमान' कोई दिल से निकाला नहीँ जाता;
--
Jagdish disha
शीशे के खिलौनो को उछाला नहीँ जाता,
मेहनत से,दुआओँ से निकल जाती हैँ राहेँ
हर काम को तकदीर पे टाला नहीँ जाता,
दामन को बचाते हैँ सभी साहब ऐ किरदार
खारोँ को भी गुलशन से निकाला नहीँ जाता,
कोशिश न तु कर,ज़र से छुपाना भी है मुशकिल
पर्दा कभी हर ऐब पे डाला नहीँ जाता,
ये बात अलग है कि गल घोँट के जी लेँ
'अरमान' कोई दिल से निकाला नहीँ जाता;
--
Jagdish disha
Wednesday, May 22, 2013
ज्ञान गंगा
1, जब मैँ 5 वर्ष का था तब मैँ सोचता था कि मेरे पिता दुनियाँ के सबसे
ताकतवर और समझदार व्यक्ति हैँ ।
2, जब मैँ 10 वर्ष का हुआ तब मैनेँ महसूस किया कि मेरे पिता को दुनियाँ
की हर चीज़ के बारे मेँ ज्ञान है ।
3, जब 15 वर्ष का हुआ तब मैनेँ महसूस किया कि मेरे पिता को दुनियाँ के
साथ चलने के लिए कुछ और ज्ञान की जरुरत है ।
4, जब 20 का हुआ तब महसूस किया कि पिता जी तो किसी और ही दुनियाँ के हैँ
और वे हमारी सोच के साथ नहीँ चल सकते ।
5, और 25 का हुआ तो महसूस हुआ कि पिता जी से किसी भी काम मेँ सलाह लेने
की जरुरत नहीँ है क्योँकि उन्हे हर काम मेँ कमी निकालने की आदत पड गयी है
।
6, जब 30 का हुआ तो महसूस करने लगा कि मेरे पिता को मेरी नक्ल से कुछ-कुछ
समझ आने लगी है ।
7, जब 35 का हुआ तब महसूस करने लगा कि अब उनसे छोटे मोटे फैसलोँ पर सलाह
ली जा सकती है ।
8, जब 40 वर्ष का हुआ तो मैने महसूस किया कि हर तरह के मामले मेँ पिता जी
की सलाह ली जा सकती है ।
9, जब मैँ 50 वर्ष का हुआ तब मैनेँ फैसला किया कि मुझे अपने पिता जी की
सलाह के बिना कुछ नहीँ करना चाहिए क्योँकि मुझे ये ज्ञान हो चुका था कि
मेरे पिता जी दुनियाँ के सबसे समझदार व्यक्ति है,पर....
मैँ अपने इस फैसले पर अमल कर पाता,इस से पहले ही पिता जी इस संसार को
अलविदा कह गऐ और मैँ अपने पिता जी की हर सलाह और तजुर्बे से वंचित रह
गया....!
Jagdish disha
ताकतवर और समझदार व्यक्ति हैँ ।
2, जब मैँ 10 वर्ष का हुआ तब मैनेँ महसूस किया कि मेरे पिता को दुनियाँ
की हर चीज़ के बारे मेँ ज्ञान है ।
3, जब 15 वर्ष का हुआ तब मैनेँ महसूस किया कि मेरे पिता को दुनियाँ के
साथ चलने के लिए कुछ और ज्ञान की जरुरत है ।
4, जब 20 का हुआ तब महसूस किया कि पिता जी तो किसी और ही दुनियाँ के हैँ
और वे हमारी सोच के साथ नहीँ चल सकते ।
5, और 25 का हुआ तो महसूस हुआ कि पिता जी से किसी भी काम मेँ सलाह लेने
की जरुरत नहीँ है क्योँकि उन्हे हर काम मेँ कमी निकालने की आदत पड गयी है
।
6, जब 30 का हुआ तो महसूस करने लगा कि मेरे पिता को मेरी नक्ल से कुछ-कुछ
समझ आने लगी है ।
7, जब 35 का हुआ तब महसूस करने लगा कि अब उनसे छोटे मोटे फैसलोँ पर सलाह
ली जा सकती है ।
8, जब 40 वर्ष का हुआ तो मैने महसूस किया कि हर तरह के मामले मेँ पिता जी
की सलाह ली जा सकती है ।
9, जब मैँ 50 वर्ष का हुआ तब मैनेँ फैसला किया कि मुझे अपने पिता जी की
सलाह के बिना कुछ नहीँ करना चाहिए क्योँकि मुझे ये ज्ञान हो चुका था कि
मेरे पिता जी दुनियाँ के सबसे समझदार व्यक्ति है,पर....
मैँ अपने इस फैसले पर अमल कर पाता,इस से पहले ही पिता जी इस संसार को
अलविदा कह गऐ और मैँ अपने पिता जी की हर सलाह और तजुर्बे से वंचित रह
गया....!
Jagdish disha
Sunday, May 19, 2013
एक नज़म अंजुम साहिब की
मसीहा हो गये कुर्बान,लेकिन तुम नहीँ समझे
मुहब्बत उनका था अरमान,लेकिन तुम नहीँ समझे...
बदन पे इतने कोडे और सलीबी खून हाथोँ पर
यह कुर्बानी नहीँ आसान,लेकिन तुम नहीँ ...
जब उसने जान दे दी और कहा ''अब सुरखरु तुम हो''
गुनाहोँ मेँ घिरा शैतान,लेकिन तुम नहीँ ...
सलीब अपनी उठाये फिर हमारे साथ तुम निकलो
तुम्हारी दुश्मनी बेजान,लेकिन तुम नहीँ ..
मज़हब की गुलामी कब,मुझे मंजूर थी 'अंजुम'
मैँ आजादी का था फरमान,लेकिन तुम नहीँ समझे ;
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मुहब्बत उनका था अरमान,लेकिन तुम नहीँ समझे...
बदन पे इतने कोडे और सलीबी खून हाथोँ पर
यह कुर्बानी नहीँ आसान,लेकिन तुम नहीँ ...
जब उसने जान दे दी और कहा ''अब सुरखरु तुम हो''
गुनाहोँ मेँ घिरा शैतान,लेकिन तुम नहीँ ...
सलीब अपनी उठाये फिर हमारे साथ तुम निकलो
तुम्हारी दुश्मनी बेजान,लेकिन तुम नहीँ ..
मज़हब की गुलामी कब,मुझे मंजूर थी 'अंजुम'
मैँ आजादी का था फरमान,लेकिन तुम नहीँ समझे ;
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Saturday, May 18, 2013
बातेँ काम की
तुँ कुछ नहीँ,यहाँ क्या है तेरा,
समझ ले गर,बात इतनी तो,
कदम 'दिश्शे' खुदा के घर को,
बढा जान ले आज अभी से;
ये बात इतने ऋषि-मुनी,पीर-पैगंबर,संत साधु दरवेश लोग कई तरीकोँ से कह गये,बार-बार समझाने के पश्चात भी हम मे से कितने ऐसे लोग होँगेँ,जो समझ पाये और जो चल पाये उस रास्ते पे जो खुदा के घर जाता है ।
बहुत फर्क है कोई बात सिर्फ सुनने और समझने मेँ।हम ऐसी बातेँ बडे ध्यान से सुन तो जरुर लेते हैँ,लेकिन,उन्हे अपने जीवन मेँ ढाल नहीँ पाते।
क्या हमे थोडा सा वक्त उस भगवान का नाम लेने के लिए नहीँ निकालना चाहिए जिनकी कृपा से हम जीवन मेँ सभी सुख संसाधनो का उपयोग कर रहे हैँ,आनंद ले रहे है उसकी बनाई हर एक वस्तु का,जो कभी भी हमारी नहीँ थी,मगर, फिर भी उसने हमेँ बख्श दीँ।
ये बात हमे नहीँ भूलनी चाहिये कि इस शरीर मेँ जो आत्मा है,उसका ये पक्का ठिकाना नहीँ है अगर प्रभु ने हमेँ मौका दिया है,कि हम उसको खोज सकेँ और अपनी आत्मा को परमात्मा से मिला सकेँ तो हमेँ इस मौके का सही फायदा लेने की भरपूर कोशिश करनी चाहिए ।
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समझ ले गर,बात इतनी तो,
कदम 'दिश्शे' खुदा के घर को,
बढा जान ले आज अभी से;
ये बात इतने ऋषि-मुनी,पीर-पैगंबर,संत साधु दरवेश लोग कई तरीकोँ से कह गये,बार-बार समझाने के पश्चात भी हम मे से कितने ऐसे लोग होँगेँ,जो समझ पाये और जो चल पाये उस रास्ते पे जो खुदा के घर जाता है ।
बहुत फर्क है कोई बात सिर्फ सुनने और समझने मेँ।हम ऐसी बातेँ बडे ध्यान से सुन तो जरुर लेते हैँ,लेकिन,उन्हे अपने जीवन मेँ ढाल नहीँ पाते।
क्या हमे थोडा सा वक्त उस भगवान का नाम लेने के लिए नहीँ निकालना चाहिए जिनकी कृपा से हम जीवन मेँ सभी सुख संसाधनो का उपयोग कर रहे हैँ,आनंद ले रहे है उसकी बनाई हर एक वस्तु का,जो कभी भी हमारी नहीँ थी,मगर, फिर भी उसने हमेँ बख्श दीँ।
ये बात हमे नहीँ भूलनी चाहिये कि इस शरीर मेँ जो आत्मा है,उसका ये पक्का ठिकाना नहीँ है अगर प्रभु ने हमेँ मौका दिया है,कि हम उसको खोज सकेँ और अपनी आत्मा को परमात्मा से मिला सकेँ तो हमेँ इस मौके का सही फायदा लेने की भरपूर कोशिश करनी चाहिए ।
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Thursday, May 16, 2013
है कोई दोस्त,आपका भी ?
आप मैँ या कोई भी इन्सान ऐसा नहीँ जिसे जिंदगी मेँ किसी मुसिबत का सामना न करना पडा हो ।मुसिबत चाहे कैसी भी हो,अपनी खुद की सिहत से जुडी,कारोबार से सबंधित याँ घरेलू प्रकार की कोई परेशानी।
जब भी ऐसी किसी वजह से मन परेशान होता है तो सबसे ज्यादा जो सहारा व होँसला किसी दोस्त मित्र के साथ की बात से मिल सकता है,वैसा किसी सगे सबंधी के पास होने से भी महसूस नहीँ होता।
वजह ये कि दोस्त हमारी खुशी व तकलीफोँ से सीधे जुडे होते हैँ क्योँ कि हम उनसे अपने सबंधियोँ की तुलना मेँ निरंतर बातचीत के द्वारा गहराई से जुडे रहते हैँ और उनका रोल ज्यादा अहम बना रहता है इसलिए भी कि बहुत सी निजी बातेँ हर कोई अपने दोस्तोँ से ही शेयर करके सुरक्षित महसूस करता है।
इसलिए दोस्ती के इस रिश्ते को सदा मधुर बनायेँ रखेँ।
भाई बहन,सबंधी हमे भगवान से बिन मांगे मिलते हैँ,मगर दोस्त हम अपनी मर्जी से चुनते हैँ,जो दिल से अच्छा हो,आपके विचारोँ की कद्र करे और आपके जज्बात को समझता हो।
इसलिए आदर्श दोस्तोँ का साथ निभायेँ,खुद भी आदर्श मित्र बनेँ।
'युँ तो सब हैँ,रिश्ते जहाँ मे,
रिश्ता दोस्ती का,ऐ खुदा !
इन्सान को बख्शी तेरी
है सबसे अच्छी सौगात';
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जब भी ऐसी किसी वजह से मन परेशान होता है तो सबसे ज्यादा जो सहारा व होँसला किसी दोस्त मित्र के साथ की बात से मिल सकता है,वैसा किसी सगे सबंधी के पास होने से भी महसूस नहीँ होता।
वजह ये कि दोस्त हमारी खुशी व तकलीफोँ से सीधे जुडे होते हैँ क्योँ कि हम उनसे अपने सबंधियोँ की तुलना मेँ निरंतर बातचीत के द्वारा गहराई से जुडे रहते हैँ और उनका रोल ज्यादा अहम बना रहता है इसलिए भी कि बहुत सी निजी बातेँ हर कोई अपने दोस्तोँ से ही शेयर करके सुरक्षित महसूस करता है।
इसलिए दोस्ती के इस रिश्ते को सदा मधुर बनायेँ रखेँ।
भाई बहन,सबंधी हमे भगवान से बिन मांगे मिलते हैँ,मगर दोस्त हम अपनी मर्जी से चुनते हैँ,जो दिल से अच्छा हो,आपके विचारोँ की कद्र करे और आपके जज्बात को समझता हो।
इसलिए आदर्श दोस्तोँ का साथ निभायेँ,खुद भी आदर्श मित्र बनेँ।
'युँ तो सब हैँ,रिश्ते जहाँ मे,
रिश्ता दोस्ती का,ऐ खुदा !
इन्सान को बख्शी तेरी
है सबसे अच्छी सौगात';
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Sunday, May 12, 2013
देखो तो सही
निगाहोँ से निगाहोँ मिलाकर तो देखो
नये लोगोँ से रिशता बनाकर तो देखो
जो है दिल मेँ उसे जता कर तो देखो
खुद को इक बार आजमा कर तो देखो
आसमाँ भी सिमट जायेगा आपके आगोश मेँ
चाहत की बाहेँ,फैला कर तो देखो
दिल की बात बता कर तो देखो ....;
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नये लोगोँ से रिशता बनाकर तो देखो
जो है दिल मेँ उसे जता कर तो देखो
खुद को इक बार आजमा कर तो देखो
आसमाँ भी सिमट जायेगा आपके आगोश मेँ
चाहत की बाहेँ,फैला कर तो देखो
दिल की बात बता कर तो देखो ....;
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