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Friday, July 1, 2016

ਹਮਜ਼ਾ (Hamza)

ਗੀਤ - ਹਮਜ਼ਾ
ਗਾਇਕ - ਸਤਿੰਦਰ ਸਰਤਾਜ
ਐਲਬਮ - ਹਮਜ਼ਾ
*********

                           ਓ ਹਮਜ਼ਾ...ਓ ਹਮਜ਼ਾ
        ਹਮਜ਼ਾ...ਹੱਕ ਹਕੂਕ ਵਸੀਲਾ,ਹਸਤੀ ਹਲਕੀ ਜੀਕਣ ਤੀਲਾ
             ਤੱਕ ਉਪਰ ਨੂੰ ਅੰਬਰ ਨੀਲਾ,ਕੀ ਕੁੱਛ ਬੋਲਦਾ...2
                      ਮਿੱਤਰਾ ਕਰ ਉਸਤੇ ਇਤਬਾਰ...
        ਮਿੱਤਰਾ ਕਰ ਉਸਤੇ ਇਤਬਾਰ,ਹੋਵੇ ਖਿੱਚ ਤਾਂ ਆਉਂਦਾ ਯਾਰ
               ਵੇ ਤੂੰ ਇਸ ਫ਼ਾਨੀ ਸੰਸਾਰ ਦੇ,ਵਿੱਚ ਕੀ ਟ੍ਹੋਲਦਾ...
                        ਹਮਜ਼ਾ...ਹੱਕ ਹਕੂਕ ਵਸੀਲਾ;

                     ਹੋ ਦਿਲ ਚੋਂ ਨਿੱਕਲੇ, ਪੌੜੀ ਚੜ੍ਹ ਗਏ
                   ਜਜ਼ਬੇ ਹਿਜਰ ਦੀ ਅੱਗ ਵਿੱਚ ਸੜ ਗਏ
       ਕਾਸਦ ਆਪੇ ਈ ਚਿੱਠੀਆਂ ਪੜ੍ਹ ਗਏ,ਜੀ ਹੁਣ ਕੀ ਕਰੀਏ...2
                               ਮੰਗਦੇ...ਹੋ ਮੰਗਦੇ
                                    ਹੋ ਮੰਗਦੇ,
       ਹੁਣ ਅਹਿਸਾਸ ਹਿਫ਼ਾਜ਼ਤ,ਸਹਿਣਾ ਦਰਦ ਤਾਂ ਕਰੀਂ ਰਿਆਜ਼ਤ
           ਦਿੰਦਾ ਇਸ਼ਕ ਨਾ ਮੂਲ ਇਜਾਜ਼ਤ,ਮੁੱਖ ਚੋਂ ਸੀ ਕਰੀਏ...
                          ਹਮਜ਼ਾ,ਹੱਕ ਹਕੂਕ ਵਸੀਲਾ;

       ਹੋ ਸਾਂਭੀਂ ਸ੍ਹੱਦਰਾਂ ਵਾਲੀ ਬਗੀਚੀ,ਜੋਬਣ ਛੋਟਾ ਜੀਕਣ ਚੀਚੀ
            ਤੇਰਾ ਮਨ ਉੱਚਾ ਮੱਤ ਨਿੱਚੀ,ਰੱਬ ਤੋਂ ਡਰ ਕੇ ਜੀ...2
                     ਲਗਦੀ ਬੋੜ੍ਹ ਨਹੀਂ ਵਿੱਚ ਗਮਲੇ...
       ਲਗਦੀ ਬੋੜ੍ਹ ਨਹੀਂ ਵਿੱਚ ਗਮਲੇ,ਤਾਹੀਂਓ ਰੂਹ ਤੇ ਹੁੰਦੇ ਹਮਲੇ
                ਆਸ਼ਿਕ ਹੋ ਜਾਂਦੇ ਨੇ ਕਮਲੇ,ਏਸੇ ਕਰਕੇ ਜੀ...
                         ਹਮਜ਼ਾ...ਹੱਕ ਹਕੂਕ ਵਸੀਲਾ;

         ਇਹਨਾਂ ਲਫਜ਼ਾਂ ਦੇ ਵਿੱਚ ਲੋਰ,ਸਾਨੂੰ ਨਵੀਂ ਸੜ੍ਹਕ ਤੇ ਤੋਰ
      ਹੁਣ ਨਈਂ ਮੁੜਨਾ ਲਾ ਲਈਂ ਜੋਰ,ਕਿ ਨੀਂਦਰ ਖੁੱਲ੍ਹ ਗਈ ਏ...2
                    ਛੱਡ ਗਏ ਮਹਿਰਮ, ਰਹਿ ਗਏ ਕੱਲੇ...
     ਛੱਡ ਗਏ ਮਹਿਰਮ ਰਹਿ ਗਏ ਕੱਲੇ,ਕਿਹੜੀ ਮੁੰਦਰੀ ਕਿਹੜੇ ਛੱਲੇ
             ਹੁਣ ਸਰਤਾਜ ਹੋਰੀਂ ਵੀ ਚੱਲੇ,ਦਾਰੂ ਡੁੱਲ੍ਹ ਗਈ ਏ...
                          ਹਮਜ਼ਾ...ਹੱਕ ਹਕੂਕ ਵਸੀਲਾ;

                     ਓ ਹਮਜ਼ਾ ! ਹੱਕ ਹਕੂਕ ਵਸੀਲਾ...
        ਮਖ਼ਮਲ ਸੂਤ ਸ਼ਤੀਰੀ ਤਿੱਲਾ,ਗੁੰਬਦ ਗਰਦਿਸ਼ ਅੰਬਰ ਨੀਲਾ
                                  ਇੱਕੋ ਹਾਣ ਦੇ...
          ਆਸ ਉਮੀਦ ਅਤੇ ਇਤਬਾਰ,ਪਿੱਪਲ ਸੜੇ ਨਰਮਦਾ ਪਾਰ
              ਮਲਕੀ ਦਰਦ,ਕਰਾਚੀ ਯਾਰ,ਤੁਸੀਂ ਨਹੀਂ ਜਾਣਦੇ...

                       ਓ ਹਮਜ਼ਾ...ਓ ਹਮਜ਼ਾ...ਹਮਜ਼ਾ
             ਹੱਕ ਹਕੂਕ ਵਸੀਲਾ,ਹਸਤੀ ਹਲਕੀ ਜੀਕਣ ਤੀਲਾ
               ਤੱਕ ਉਪਰ ਨੂੰ ਅੰਬਰ ਨੀਲਾ,ਕੀ ਕੁੱਛ ਬੋਲਦਾ
                     ਮਿੱਤਰਾ ਕਰ ਉਸਤੇ ਇਤਬਾਰ..ਅ..
                                ਹੋ..ਓ..ਅ..ਹੋ..।।

          *********************************
                              ਗਾਇਕ ਅਤੇ ਲੇਖਕ
                              ਸਤਿੰਦਰ “ਸਰਤਾਜ"
  (First time read in Punjabi language)

Sunday, June 19, 2016

कहां पहचान अच्छी है

                       न उनके आने की खबर थी
                       न उनके जाने का पता हमें,
                     कैसे कह दें, कि उनसे हमारी
                     जान-पहचान बहुत अच्छी है ;

                     उनसे मिला भी जाये तो कैसे
                    गर खुद ही न चाहें मिलना वो,
                   जुदाई को अकेले ही जिया हमने
                  कैसे माने कि उनके दिल में भी...
                हमसे मुलाकात की तडप सच्ची है ;

                शक्क नहीं हमें अपनी मुहब्बत पर
               थोड़ा वो भी तो जताऐं चाहत अपनी,
              संभव क्यों नही,दरिया से भी पार पाना
               लगता है लेकिन इरादों की बेडी मे...
                   उनके लगी पतवार कच्ची है ;

                            इसीलिए तो.......
                नहीं लगता कि पहचान अच्छी है
              सच ही तो है...कहां पहचान अच्छी है।।
              

Saturday, April 9, 2016

ਭਗਤ ਸਿੰਹਾ...ਹੁਣ ! ਕਹਿਣ ਨੂੰ ਕੀ ਬਾਕੀ ਰਹਿ ਗਿਆ...!


                           ਭਗਤ ਸਿੰਹਾ...ਹੁਣ !
                  ਕਹਿਣ ਨੂੰ ਕੀ ਬਾਕੀ ਰਹਿ ਗਿਆ...!

                    ਕਿਸੇ ਨੂੰ ਕੀ ਦੋਸ਼ ਦੇਈਏ...ਬੱਸ
                  ਘਰ ਦੇ ਈ ਬਣਕੇ ਡਾਕੂ ਬਹਿ ਗਏ,
                        ਹੁਣ ਮਾਰਦੇ ਧੱਕੇ ਓਹ...
                ਵੋਟਾਂ ਵੇਲੇ ਸੀ ਜਿਹੜੇ ਬਾਪੂ ਕਹਿ ਗਏ,
                   ਸਮਾਂ ਆਉਣ ਵਾਲਾ...ਮੁੜ ਫੇਰ !
               ਸ਼ਾਹੂਕਾਰਾਂ ਦੀ ਹੱਟੀ ਦੇ ਰਾਹ ਪੈ ਗਿਆ,

                        ਭਗਤ ਸਿੰਹਾ...ਹੁਣ !
                ਕਹਿਣ ਨੂੰ ਕੀ ਬਾਕੀ ਰਹਿ ਗਿਆ...!

                        ਜਦੋਂ ਤੁਰੇ ਹੋਣੇ ਤੁਸੀਂ...
                      ਭਾਰਤ ਮਾਂ ਦੀ ਰਾਖੀ ਨੂੰ,
                        ਨਹੀਂ ਸੋਚਿਆ ਹੋਣਾ,
                 ਕਿ ਕਦੇ ਉਹ ਦਿਨ ਆਉਣਗੇ ?
                                  ....
            ਮਾਂ ਦੀ ਲਾਜ ਨੂੰ ਪੁੱਤ ਕੁੱਤੇ ਹੱਥ ਪਾਉਣਗੇ !

              ਵੇਖੋ ਜੇ ਕਿਤੋਂ...ਹੁਣ ਥੋਡੀ ਨਜਰ ਪਵੇ !
                ਅੱਜ ਓਸੇ ਮਾਂ ਦੀ ਬੋਲੀ ਲਾਉਣ...
                         ਪੁੱਤ ਅੜੇ ਖੜ੍ਹੇ..!

                  ਲੁੱਟ ਲੋ ਜਿਨ੍ਹਾਂ ਲੁੱਟਿਆ ਜਾਵੇ...
                 ਅੱਜ ਇਹ ਦਸਤੂਰ ਏ ਲੋਕਾਂ ਦਾ,
                  ਭਰਦਾ ਪਤਾ ਨੀਂ ਢਿੱਡ ਕਿਉਂ...
                 ਇਹਨਾਂ ਰੱਤ ਪੀਣੀਆਂ ਜੋਕਾਂ ਦਾ,
                                  ...
                  ਤੁਸੀਂ ਤਾਂ ਵੀਰਿਓ...ਐਂਵੇਂ ਦੱਸ..
                                  ...
                       ਕਿਹਨਾਂ ਪਿੱਛੇ ਮਰੇ...!
                                  ...
                   ਕਿਉਂ ਇਹਨਾਂ ਲਈ ਮਰੇ ?

                        ਜਗਦੀਸ਼ "ਦਿੱਸ਼ਾ
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Monday, April 4, 2016

दीदार

जुबां पे मेरी हर वक्त
खुदा के बाद जिसका
नाम आता है.......
वो संगदिल है इतना
कि मिले बिन ही
निकल जाता है,
खैर...
चलो कोई बात नहीं
गुरूर उसका भी
खुदा सलामत रखे,
मुझे भी उसके
दीद की तडप
कयामत तक रहे,
कभी वो वक्त
भी जरूर आयेगा
जब दिल उसका भी
पसीज जायेगा,
इश्क नाम नहीं
सहज ही दीदार का
मजा तब है जब
अपने आप
खिचां आये
तेरी चौखट पे
कदम यार का।
जगदीश "दिश्शा"
(४अप्रैल२०१६)

Tuesday, December 9, 2014

'न मानोँ तो आजमा के देखो'

दग़ा खाते हैँ लोग,अपनी माशूकोँ से
खोटे सिक्कोँ याँ पुरानी बंदुकोँ से,
हमने खायी है दग़ा,यारोँ की यारी से
और अपनी ही वफ़ा के सुलुकोँ से,
दुश्मन भले ही लाख बुरा सही
जिसे देख के हम सावधान रहेँ,
लेकिन,अच्छा है उन सभी से
जिन यारोँ के साथ हमारे कारवाँ रहे,
संभले कोई भी अपना बुरा देखकर
गर सामने से कोई उसपे वार करे,
जिन्हे साथ साथ ले के घूमा करते थे कभी
आज मारने हमे,खडे हैँ वो,बगल मेँ तलवार धरे,
एतबार नहीँ गर तुमको हमारी बात का साथी
तो अतीत के पन्ने जरा पल्टा के देखो,
सबसे बडा दुश्मन तुम्हारा कोई अपना होगा
न मानोँ गर तो बात आजमा कर देखो..।
22दिश्शा (23.9.99)

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Saturday, August 23, 2014

Vikas Rajput

Vikas Rajput
कल मैंनॆ भी सोचा था कॊई, श्रृँगारिक गीत लिखूं ,
बावरी मीरा की प्रॆम-तपस्या, राधा की प्रीत लिखूं ,
कुसुम कली कॆ कानों मॆं,मधुर भ्रमर संगीत लिखूं,
जीवन कॆ एकांकी-पन का,कॊई सच्चा मीत लिखूं,
एक भयानक सपनॆं नॆं, चित्र अनॊखा खींच दिया,
श्रृँगार सृजन कॊ मॆरॆ, करुणा कृन्दा सॆ सींच दिया,
यॆ हिंसा का मारा भारत, यह पूँछ रहा है गाँधी सॆ,
कब जन्मॆगा भगतसिंह, इस शोषण की आँधी सॆ,
राज-घाट मॆं रोता गाँधी, अब बॆवश लाचार लिखूंगा !!
दिनकर का वंशज हूं मैं, श्रृँगार नहीं अंगार लिखूंगा !!१!!

चिंतन बदला दर्शन बदला, बदला हर एक चॆहरा,
दही दूध कॆ सींकॊं पर, लगा बिल्लियॊं का पहरा,
इन भ्रष्टाचारों की मंडी मॆं, बर्बाद बॆचारा भारत है,
जलती हॊली मे फंसा हुआ,प्रह्लाद हमारा भारत है,
जीवन का कडुआ सच है, छुपा हुआ इन बातॊं मॆं,
अधिकार चाहिए या शॊषण,चयन तुम्हारॆ हाथॊं मॆं,
जल रही दहॆज की ज्वाला मॆं,नारी की चीख सुनॊं,
जीवन तॊ जीना ही है, क्रांति चुनॊं या भीख चुनॊं,
स्वीकार तुम्हॆं समझौतॆ, मुझकॊ अस्वीकार लिखूंगा !!
बरदाई का वंशज हूं मैं, श्रंगार नहीं अंगार लिखूंगा !!२!!
दिनकर का वंशज हूं मैं...........

उल्टी-सीधी चालें दॆखॊ, नित शाम सबॆरॆ कुर्सी पर,
शासन कर रहॆ दुःशासन,अब चॊर लुटॆरॆ कुर्सी पर,
सत्ता-सुविधाऒं पर अपना, अधिकार जमायॆ बैठॆ हैं,
गांधी बाबा की खादी कॊ, यॆ हथियार बनायॆ बैठॆ हैं,
कपट-कुटी मॆं बैठॆ हैं जॊ, परहित करना क्या जानॆं,
संगीनॊं कॆ सायॆ मॆं यॆ, सरहद का मरना क्या जानॆं,
अनगिनत घॊटालॆ करकॆ भी,जब पा जायॆं बहाली यॆ,
अमर शहीदॊं कॆ ताबूतॊं मॆं, क्यूं ना खायॆं दलाली यॆ,
इन भ्रष्टाचारी गद्दारॊं का, मैं काला किरदार लिखूंगा !!
नज़रुल का वंशज हूं मैं, श्रृँगार नहीं अंगार लिखूंगा !!३!!
दिनकर का वंशज हूं मैं...........

कण-कण मॆं सिसक रही,आज़ाद भगत की अभिलाषा,
अब्दुल हमीद की साँसॆं पूंछें, हैं आज़ादी की परिभाषा,
कब भारत की नारी कब, दामिनी बन कर दमकॆगी,
कब चूडी वालॆ हाँथॊं मॆं, वह तलवार पुरानी चमकेगी,
अपनॆं अपनॆं बॆटॊं कॊ हम, दॆश भक्ति का पाठ पढा दॆं,
जिस माँ की गॊदी खॆलॆ, उसकॆ चरणॊं मॆं भॆंट चढा दॆं,
भारत माँ कॆ बॆटॊं कॊ ही, उसका हर कर्ज चुकाना है,
आऒ मिलकर करॆं प्रतिज्ञा, माँ की लाज बचाना है,
सिसक रही भारत माँ की, मैं बहती अश्रुधार लिखूंगा !!
कवि-भूषण का वंशज हूं मैं,श्रृँगार नहीं अंगार लिखूंगा !!४!!
दिनकर का वंशज हूं मैं...........

Sunday, August 3, 2014

कहानी छोटी तड़प गहरी

बहुत याद आये वो गुज़रा जमाना
आपकी एक झलक पाने को
मेरा तड़प जाना...
कभी दरवाजे पे निगाह तो कभी
धूप में छत पे ही सूख जाना,
तुम्हारे घर की वो
पीछे की सीढियों पे निगाह तो
हर वक्त रहती थी....
तेरे दीदार को कई बार,तरस जाना...
मिलने का मौका एक आध बार मिला
केवल ख़तों से ही काम चलाना...
सच कहूं मैं बिल्कुल अनाडी़ था
कभी हाथ न पकडा,न गले लगाया
लेकिन सच ये भी है कि आपके सिवा
कोई और न था इस दिल में बस पाया...
कितना प्यारे थे तुम मुझे
ये कैसे बतलाऊं,खोल के दिल
कैसे दिखलाऊं,
तुम संग जिंदगी बिताने की चाह थी
तुम बिन जिंदगी को जीना कैसे सिखाऊं...
वक्त की तहों मे लिपट के बेशक्क
मेरा प्यार थोडा दब सा गया था,
लेकिन रूह पर लिखे तेरे नाम को
मैं तो चाह कर भी न मिटा पाऊं...
एक एक पल अपनी बर्बादी का
नहीं भूला,मुझे आज भी याद है,
दर्द जुदाई का बाद मुद्दत के
आज भी बरकरार है ....
अपनी आंखों के सामने अपना प्यार
किसी और का होता,देखता रहा
आखरी मुलाकात तुम छत पे आयी
कुछ बात भी हुई शायद...
फिर तो बस तारों को देखता रहा...
शायद तुम्हे मेरी तड़प का अहसास
इतना न हो,पर खुदा जानता है,
अपनी जिंदगी को खोकर न रोये
ये मेरा दिल है दिलबर...
कहाँ मानता है.................!

Tuesday, May 20, 2014

चल...तु चल तो सही

चल ! ...तु चल तो सही
भविष्य बदल खुद अपना,

कोस न किसमत को अपनी
कर्म से पूर्ण हो...खुद सपना,

राह बदल गर मंजिल दूर
छोड किसी की पैड मेँ...
यूँ भटक के तु पाँव रखना,

वो कर जो तु कर सके
व्यर्थ गैरों की अग्न में तपना,

'दिश्शे' दिशा कोई नयी चुन
खूबसूरत बहुत जिंदगी ये
बूँद-बूँद समो आगोश...

पथरीले पथ पे मंजिल पाने
तुझसे तेज भागेगा...
जो,पाला है...तुमने सपना...!

Tuesday, August 27, 2013

वाकई,शौक बडी चीज़ है..!

बहुत वर्षों के बाद आज फिर पैनसिल को पकडा तो पहले ये लगा कि जैसे सब भूल गया,लेकिन बिना सोचे जो पेपर शीट और पैनसिल कलर ले आया था सोच रहा था,उनका करुँ क्या ?तभी मेरे बेटे ने कहा पापा,ये कलर हमेँ दे दो और हमे ड्राईंग करना सिखाओ ।फिर न चाहते हुए भी उनके लिए एक चित्र बनाना शुरु कर दिया।आहिस्ता आहिस्ता उस चित्र को बनाने मे रम गया।पता ही नहीँ चला कब बच्चे मुझे चित्र बनाता छोड अपना खेल खेलने लगे।पर,मैँ तो सब भूल कर खो गया अपने उस शौक को पूरा करने में,जो पता नहीं कब का खो गया था जिंदगी की दौडधूप में।
जैसे जैसे मैं चित्र बनाता गया,मुझे लगने लगा कि मैनें बेवजह अपने शौक का गला घोंट दिया था,अब ऐसा नहीं होगा।मैँ आज से ही किसी न किसी तरह अपने शौक (जो कभी मेरी जिंदगी का लक्षय था)से जुडा रहूंगा।
जो दिक्कतेँ,परेशानीयाँ अकसर हमारी जिंदगी पे हावी रहती हैं,उन से कुछ पल निज़ात पाने का ये सबसे बढीया तरीका भी है।
(उस चित्र की एक प्रति मैँ यहाँ पोसट कर रहा हूँ)

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Friday, May 24, 2013

इशक

मैनेँ अपनी जिँदगी मे
प्यार कभी नहीँ किया था,
मैँ मरा नहीँ परवानोँ की तरह कभी
प्यार जिँदगी से किया था,
क्योँ कि कभी देखा नहीँ
किसी ने प्यार से मेरी तरफ,
इसलिए अहसास प्यार का
हुआ ही नहीँ था,
लेकिन एक दिन खुदा की रहमत हुई
एक हसीना से आँखे चार हुई,
जबरदस्ती दिल मेँ मेरे उमंग जागी
वर्षो से सोई भूतनी इश्क की फिर जागी,
आगे तो मैँ गली मेँ खडना आवारगी समझता था
लेकिन दो चार दिन बीते
मैँ एक आध घंटा चौक मेँ खडा करता था,
उस लडकी से दोबारा मुलाकात हुई
मिलना जुलना फिर इकरार
सच्च मानोँ तो हमारे बीच
जल्द ही कोई दीवार न रही,
घुल मिल गये थोडे दिनोँ मेँ ऐसे
हो प्यार जन्मोँ से हमारा जैसे,
ऐसी गजब प्यार की कायम मिसाल हुई,
न रह सकते थे मिले बगैर एक दिन भी
याद मे उनकी लगी रहती थी एक अगन सी,
कभी होटल,कभी सिनेमा
कभी लेकर जाता क्लबोँ मेँ उसे
भले ही हाल मेरा बिल्कुल था,
लगभग एक महिना रही वो करती ऍश
कभी खाना पीना,कभी घूमना फिरना
कभी तो माँग भी लेती थी कैश,
घर वालोँ की तरफ से पैसोँ के लिए जवाब था
लेकर जाता लेकिन कहीँ से भी मैँ पैसे
यारो !सामने माशूक के तो मैँ नवाब था ।
खैर,अब मेरा इश्क कुछ ठंडा पड रहा था
होले होले सर पे कर्ज भी बहुत चढ गया था,
एक दिन मैनेँ बात सारी उसको बताई
भई उसने भी बहुत हमदर्दी जताई,
उस समय अहसास मुझे कुछ अपनोँ सा हुआ
चलो किसी ने तो जानी इस दिल की हाये दुहाई,
अब बहुत दिन बीते हमेँ मिले हुए
न गया मै उसके पास,न वो आई
मंदे इशक के कुछ हालात हुऐ,
एक दिन मैँ अपनी हीरो साईकल के साथ
जिसकी हालत कुछ ख्सता थी
साईकल वाले की दुकान पे खडा था
फटे टायर की बदौलत
एक बडा पटाखा टयूब मेँ पडा था,
तभी एक नई मोटरसाईकल
दो सवारीयोँ के साथ
आँधी की तरह मेरे पास से गुजरी
मैने मुँह मे ही उसे कुछ बुरा भला कहा
'तभी दिखाई पडा कुछ साफ यारो'
धूल मिट्टी की कुछ हटती जा रही थी
जो माशूक कल थी मेरी जिँदगी
वो आज नई मोटरसाईकल पे
किसी और के संग चली जा रही थी,
वो तो शायद इन बातोँ की आदी थी
लेकिन मेरा दिल बहुत रोया
ऐसा हुआ था मैँ इश्क मे अँधा
कि मैने अपना आप खोया था
टूटे दिल ने एक आवाज दी
कि बेदर्दी !मैँ तो तेरी
बेवफाई सह गया,
किसी और को धोखा मत देना
वो शायद नहीँ सहेगा,
काँटा तेरे प्यार का जिँदगी भर
दिल मेँ मेरे चुभता रहेगा
दिल मेँ ....,
(ये कविता करीब 16-17 साल पहले मैनेँ लिखी होगी,समझ कम थी पर जुनून
था,जैसी भी लिखी थी,वैसी ही आपकी नजर की है)

--
Jagdish disha

Life mantras