आज जो हालात भारत मेँ कन्या भ्रूण और नाबालिग लडकीयों के यौन शोषण को
लेकर बने हुए हैं वो गहन चिंता का विष्य होने के साथ साथ भारत की महान
संस्कृति की साख पर बदनुमा दाग़ हैं।
और उसपे त्रासदी ये भी है कि जिस भारत वर्ष को आध्यात्मिक देश का दर्ज़ा
हासिल है उस भूमि पर जो ये घिनौने कृत्य अंजाम दिये जा रहे हैं उन्मे आम
आदमी से ज्यादा साधु-संतों का शुमार होना निहायत ही शर्म की बात है।साधु
संत याँ आध्यात्मिक गुरुओँ का नाम ऐसे प्रकरणोँ में आना समाज में खत्म हो
रही नैतिकता का वो रुप हैं जिसके आगे हम और इन्सानों से किसी प्रकार की
नैतिकता की आस लगायें तो बेमानी होगी।क्योंकि हमारे पूर्वजों के समय से
जो संस्कारों की शिक्षा का हवाला इस देश के बच्चों को दिया जाता रहा है
उन संसकारों के मंदिर में साधु महात्माओं का स्थान शीर्ष पर है और भगवान
स्वरूप उन्हे मान्यता प्रदान की गयी है:
तीन लोक नौ खंड में,गुरु से बडा न कोये,
कर्ता करे न कर,सके गुरु करे सो होये;
पिछ्ले कुछ समय से ऐसी वारदातें लोगों के विश्वास को तार तार कर रहीं हैं।
मेरी व्यक्तिगत राय है कि इन सबके पीछे मौजूद पुख्ता कारण जो है वो ये कि
साधु-संत,और गुरुजनों की जीवनशैली अब वैसी न होना जैसी का पुरानें समयोँ
में वर्णन मिलता है।
देखिये,सुख सुविधायें तो उन पुरानें वक्तों में भी बहुत थीं,जब उन्हें
त्याग लोग सन्यासी बनते थे।परमात्मा की खोज में सब सुविधायें छोडछाड वो
आश्रमों में कठिन परिस्थितियों को अपनाकर अपना जीवन व्यतीत करते थे,और
मुक्ति की खोज और समस्त जीवों के कल्याण हेतू अपना जीवन अर्पण कर देते
थे।
क्या आज कोई भी संत आपको उस कोटि का दिखाई पडता है?मेरी जिंदगी में तो
वैसा न मैनें किसी से सुना और न खुद देखा है।आजकल के ज्यादातर गुरु बातें
तो बहुत उँचीं करते हैं,लेकिन उनको न तो वो अपने भक्तों के जीवन में उतार
पाते हैं और न हीं खुद उन बातों पर खरे उतरते हैं।
भक्तों की बेशुमार भीड,करोडों रुपयों की लागत से तैयार आश्रम,खुद का
अत्याधुनिक सुविधायें जैसे महंगी कारें,मोबाइल,एसी कुटियायें और देश
विदेश की यात्रायों से लैस होना,एक प्रकार का 'भोग' ही तो
हैं।भोग-विलास,अंहकार और लालच जैसी जिन बुरी आदतों को छोड साधु का चोला
पहना जाता है,उन्ही को वो दोबारा से ग्रहण कर,किस तरह का भला जनता का कर
सकते है?इन बातों से मैं,आप सभी भलीभांति परिचित्त हैं।
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