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Sunday, May 19, 2013

एक नज़म अंजुम साहिब की

मसीहा हो गये कुर्बान,लेकिन तुम नहीँ समझे
मुहब्बत उनका था अरमान,लेकिन तुम नहीँ समझे...
बदन पे इतने कोडे और सलीबी खून हाथोँ पर
यह कुर्बानी नहीँ आसान,लेकिन तुम नहीँ ...
जब उसने जान दे दी और कहा ''अब सुरखरु तुम हो''
गुनाहोँ मेँ घिरा शैतान,लेकिन तुम नहीँ ...
सलीब अपनी उठाये फिर हमारे साथ तुम निकलो
तुम्हारी दुश्मनी बेजान,लेकिन तुम नहीँ ..
मज़हब की गुलामी कब,मुझे मंजूर थी 'अंजुम'
मैँ आजादी का था फरमान,लेकिन तुम नहीँ समझे ;

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