एक ही जगत है-यही जगत।फिर चाहो नर्क बना लो,चाहे स्वर्ग।जगत मात्र एक अवसर है।कोरी किताब-क्या तुम लिखोगे,ये तुम पर निर्भर है।और केवल तुम पर।किसी और की कोई जिम्मेवारी नहीँ है।नर्क मेँ जीना हो नर्क बना लो-स्वर्ग मेँ जीना हो स्वर्ग बना लो-तुम्हारे हाथोँ का ही सारा निर्माण है।यहाँ सब मौजूद है।युद्ध करना हो तो युद्ध और प्रेम की छाया मेँ जीना हो तो प्रेम की छाया।शांति के फूल
उगाने होँ तो कोई रोकता नहीँ,निर्वाण के दीये जलाने होँ तो कोई बुझाता नहीँ-और अगर जख्म ही छाती मेँ लगाने होँ तो कोई हाथ रोकने आयेगा नहीँ।
तुम मुक्त हो।तुम स्वतंत्र हो।मनुष्य की यही महिमा है,यही उसका विषाद भी।विषाद,कि मनुष्य स्वतंत्र है;गलत करने को भी स्वतंत्र है।स्वतन्त्रता मेँ गलत करने की स्वतन्त्रता सम्मिलित है।अगर ठीक करने की ही स्वतन्त्रता होती तो उसे स्वतन्त्रता ही क्या कहते।स्वतन्त्रता का अर्थ ही होता है,गलत होने की स्वतन्त्रता भी है।चाहो तो मिटा लो,चाहे तो बना लो।चाहो तो गिर जाओ,मिट्टी और
कीचड मेँ हो जाओ और चाहो तो कमल बन जाओ।
जीवन एक कोरा अवसर है-बिल्कुल कोरा अवसर।जैसे कोरा कैनवास हो और चित्रकार उस पर चित्र उभारे;कि अन-गढ़ पत्थर हो,कि मूर्तीकार उसमेँ मूर्ती निखारे।शब्द उपलब्ध है;चाहो गालीयाँ बना लो और चाहे गीत।इस बात को जितने गहरे मे उतर जाने दो हृदय मे,उतना अच्छा है। भूलकर भी मत सोचना कि कोई तुम्हारे भाग्य का निर्माण कर रहा है।उस बात मे बडा खतरा है।फिर आदमी अवश हो जाता है।फिर जो हो रहा है,हो
रहा है।फिर सहने के सिवाय कोई उपाय नहीँ।फिर आदमी मिट्टी का लौँदा हो जाता है;उसके प्राण सूख जाते हैँ।उसमेँ जीवन की धार नहीँ बहती।चुनौतियोँ को अंगीकार करने की सामर्थ्य खो जाती है।और जहां चुनौतियोँ को अंगीकार करने की सामर्थ्य नही,वहां आत्मा का जन्म नहीँ।आत्मा जनमती है,चुनौतियोँ के स्वीकार करने से।तुफानोँ मेँ पैदा होती है आत्मा।आंधियोँ-अंधड़ोँ मेँ पैदा होती है आत्मा।
(भगवान श्री रजनीश-ओशो)

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