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Friday, July 1, 2016

ਹਮਜ਼ਾ (Hamza)

ਗੀਤ - ਹਮਜ਼ਾ
ਗਾਇਕ - ਸਤਿੰਦਰ ਸਰਤਾਜ
ਐਲਬਮ - ਹਮਜ਼ਾ
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                           ਓ ਹਮਜ਼ਾ...ਓ ਹਮਜ਼ਾ
        ਹਮਜ਼ਾ...ਹੱਕ ਹਕੂਕ ਵਸੀਲਾ,ਹਸਤੀ ਹਲਕੀ ਜੀਕਣ ਤੀਲਾ
             ਤੱਕ ਉਪਰ ਨੂੰ ਅੰਬਰ ਨੀਲਾ,ਕੀ ਕੁੱਛ ਬੋਲਦਾ...2
                      ਮਿੱਤਰਾ ਕਰ ਉਸਤੇ ਇਤਬਾਰ...
        ਮਿੱਤਰਾ ਕਰ ਉਸਤੇ ਇਤਬਾਰ,ਹੋਵੇ ਖਿੱਚ ਤਾਂ ਆਉਂਦਾ ਯਾਰ
               ਵੇ ਤੂੰ ਇਸ ਫ਼ਾਨੀ ਸੰਸਾਰ ਦੇ,ਵਿੱਚ ਕੀ ਟ੍ਹੋਲਦਾ...
                        ਹਮਜ਼ਾ...ਹੱਕ ਹਕੂਕ ਵਸੀਲਾ;

                     ਹੋ ਦਿਲ ਚੋਂ ਨਿੱਕਲੇ, ਪੌੜੀ ਚੜ੍ਹ ਗਏ
                   ਜਜ਼ਬੇ ਹਿਜਰ ਦੀ ਅੱਗ ਵਿੱਚ ਸੜ ਗਏ
       ਕਾਸਦ ਆਪੇ ਈ ਚਿੱਠੀਆਂ ਪੜ੍ਹ ਗਏ,ਜੀ ਹੁਣ ਕੀ ਕਰੀਏ...2
                               ਮੰਗਦੇ...ਹੋ ਮੰਗਦੇ
                                    ਹੋ ਮੰਗਦੇ,
       ਹੁਣ ਅਹਿਸਾਸ ਹਿਫ਼ਾਜ਼ਤ,ਸਹਿਣਾ ਦਰਦ ਤਾਂ ਕਰੀਂ ਰਿਆਜ਼ਤ
           ਦਿੰਦਾ ਇਸ਼ਕ ਨਾ ਮੂਲ ਇਜਾਜ਼ਤ,ਮੁੱਖ ਚੋਂ ਸੀ ਕਰੀਏ...
                          ਹਮਜ਼ਾ,ਹੱਕ ਹਕੂਕ ਵਸੀਲਾ;

       ਹੋ ਸਾਂਭੀਂ ਸ੍ਹੱਦਰਾਂ ਵਾਲੀ ਬਗੀਚੀ,ਜੋਬਣ ਛੋਟਾ ਜੀਕਣ ਚੀਚੀ
            ਤੇਰਾ ਮਨ ਉੱਚਾ ਮੱਤ ਨਿੱਚੀ,ਰੱਬ ਤੋਂ ਡਰ ਕੇ ਜੀ...2
                     ਲਗਦੀ ਬੋੜ੍ਹ ਨਹੀਂ ਵਿੱਚ ਗਮਲੇ...
       ਲਗਦੀ ਬੋੜ੍ਹ ਨਹੀਂ ਵਿੱਚ ਗਮਲੇ,ਤਾਹੀਂਓ ਰੂਹ ਤੇ ਹੁੰਦੇ ਹਮਲੇ
                ਆਸ਼ਿਕ ਹੋ ਜਾਂਦੇ ਨੇ ਕਮਲੇ,ਏਸੇ ਕਰਕੇ ਜੀ...
                         ਹਮਜ਼ਾ...ਹੱਕ ਹਕੂਕ ਵਸੀਲਾ;

         ਇਹਨਾਂ ਲਫਜ਼ਾਂ ਦੇ ਵਿੱਚ ਲੋਰ,ਸਾਨੂੰ ਨਵੀਂ ਸੜ੍ਹਕ ਤੇ ਤੋਰ
      ਹੁਣ ਨਈਂ ਮੁੜਨਾ ਲਾ ਲਈਂ ਜੋਰ,ਕਿ ਨੀਂਦਰ ਖੁੱਲ੍ਹ ਗਈ ਏ...2
                    ਛੱਡ ਗਏ ਮਹਿਰਮ, ਰਹਿ ਗਏ ਕੱਲੇ...
     ਛੱਡ ਗਏ ਮਹਿਰਮ ਰਹਿ ਗਏ ਕੱਲੇ,ਕਿਹੜੀ ਮੁੰਦਰੀ ਕਿਹੜੇ ਛੱਲੇ
             ਹੁਣ ਸਰਤਾਜ ਹੋਰੀਂ ਵੀ ਚੱਲੇ,ਦਾਰੂ ਡੁੱਲ੍ਹ ਗਈ ਏ...
                          ਹਮਜ਼ਾ...ਹੱਕ ਹਕੂਕ ਵਸੀਲਾ;

                     ਓ ਹਮਜ਼ਾ ! ਹੱਕ ਹਕੂਕ ਵਸੀਲਾ...
        ਮਖ਼ਮਲ ਸੂਤ ਸ਼ਤੀਰੀ ਤਿੱਲਾ,ਗੁੰਬਦ ਗਰਦਿਸ਼ ਅੰਬਰ ਨੀਲਾ
                                  ਇੱਕੋ ਹਾਣ ਦੇ...
          ਆਸ ਉਮੀਦ ਅਤੇ ਇਤਬਾਰ,ਪਿੱਪਲ ਸੜੇ ਨਰਮਦਾ ਪਾਰ
              ਮਲਕੀ ਦਰਦ,ਕਰਾਚੀ ਯਾਰ,ਤੁਸੀਂ ਨਹੀਂ ਜਾਣਦੇ...

                       ਓ ਹਮਜ਼ਾ...ਓ ਹਮਜ਼ਾ...ਹਮਜ਼ਾ
             ਹੱਕ ਹਕੂਕ ਵਸੀਲਾ,ਹਸਤੀ ਹਲਕੀ ਜੀਕਣ ਤੀਲਾ
               ਤੱਕ ਉਪਰ ਨੂੰ ਅੰਬਰ ਨੀਲਾ,ਕੀ ਕੁੱਛ ਬੋਲਦਾ
                     ਮਿੱਤਰਾ ਕਰ ਉਸਤੇ ਇਤਬਾਰ..ਅ..
                                ਹੋ..ਓ..ਅ..ਹੋ..।।

          *********************************
                              ਗਾਇਕ ਅਤੇ ਲੇਖਕ
                              ਸਤਿੰਦਰ “ਸਰਤਾਜ"
  (First time read in Punjabi language)

Sunday, June 19, 2016

कहां पहचान अच्छी है

                       न उनके आने की खबर थी
                       न उनके जाने का पता हमें,
                     कैसे कह दें, कि उनसे हमारी
                     जान-पहचान बहुत अच्छी है ;

                     उनसे मिला भी जाये तो कैसे
                    गर खुद ही न चाहें मिलना वो,
                   जुदाई को अकेले ही जिया हमने
                  कैसे माने कि उनके दिल में भी...
                हमसे मुलाकात की तडप सच्ची है ;

                शक्क नहीं हमें अपनी मुहब्बत पर
               थोड़ा वो भी तो जताऐं चाहत अपनी,
              संभव क्यों नही,दरिया से भी पार पाना
               लगता है लेकिन इरादों की बेडी मे...
                   उनके लगी पतवार कच्ची है ;

                            इसीलिए तो.......
                नहीं लगता कि पहचान अच्छी है
              सच ही तो है...कहां पहचान अच्छी है।।
              

Monday, April 4, 2016

दीदार

जुबां पे मेरी हर वक्त
खुदा के बाद जिसका
नाम आता है.......
वो संगदिल है इतना
कि मिले बिन ही
निकल जाता है,
खैर...
चलो कोई बात नहीं
गुरूर उसका भी
खुदा सलामत रखे,
मुझे भी उसके
दीद की तडप
कयामत तक रहे,
कभी वो वक्त
भी जरूर आयेगा
जब दिल उसका भी
पसीज जायेगा,
इश्क नाम नहीं
सहज ही दीदार का
मजा तब है जब
अपने आप
खिचां आये
तेरी चौखट पे
कदम यार का।
जगदीश "दिश्शा"
(४अप्रैल२०१६)

Friday, May 24, 2013

इशक

मैनेँ अपनी जिँदगी मे
प्यार कभी नहीँ किया था,
मैँ मरा नहीँ परवानोँ की तरह कभी
प्यार जिँदगी से किया था,
क्योँ कि कभी देखा नहीँ
किसी ने प्यार से मेरी तरफ,
इसलिए अहसास प्यार का
हुआ ही नहीँ था,
लेकिन एक दिन खुदा की रहमत हुई
एक हसीना से आँखे चार हुई,
जबरदस्ती दिल मेँ मेरे उमंग जागी
वर्षो से सोई भूतनी इश्क की फिर जागी,
आगे तो मैँ गली मेँ खडना आवारगी समझता था
लेकिन दो चार दिन बीते
मैँ एक आध घंटा चौक मेँ खडा करता था,
उस लडकी से दोबारा मुलाकात हुई
मिलना जुलना फिर इकरार
सच्च मानोँ तो हमारे बीच
जल्द ही कोई दीवार न रही,
घुल मिल गये थोडे दिनोँ मेँ ऐसे
हो प्यार जन्मोँ से हमारा जैसे,
ऐसी गजब प्यार की कायम मिसाल हुई,
न रह सकते थे मिले बगैर एक दिन भी
याद मे उनकी लगी रहती थी एक अगन सी,
कभी होटल,कभी सिनेमा
कभी लेकर जाता क्लबोँ मेँ उसे
भले ही हाल मेरा बिल्कुल था,
लगभग एक महिना रही वो करती ऍश
कभी खाना पीना,कभी घूमना फिरना
कभी तो माँग भी लेती थी कैश,
घर वालोँ की तरफ से पैसोँ के लिए जवाब था
लेकर जाता लेकिन कहीँ से भी मैँ पैसे
यारो !सामने माशूक के तो मैँ नवाब था ।
खैर,अब मेरा इश्क कुछ ठंडा पड रहा था
होले होले सर पे कर्ज भी बहुत चढ गया था,
एक दिन मैनेँ बात सारी उसको बताई
भई उसने भी बहुत हमदर्दी जताई,
उस समय अहसास मुझे कुछ अपनोँ सा हुआ
चलो किसी ने तो जानी इस दिल की हाये दुहाई,
अब बहुत दिन बीते हमेँ मिले हुए
न गया मै उसके पास,न वो आई
मंदे इशक के कुछ हालात हुऐ,
एक दिन मैँ अपनी हीरो साईकल के साथ
जिसकी हालत कुछ ख्सता थी
साईकल वाले की दुकान पे खडा था
फटे टायर की बदौलत
एक बडा पटाखा टयूब मेँ पडा था,
तभी एक नई मोटरसाईकल
दो सवारीयोँ के साथ
आँधी की तरह मेरे पास से गुजरी
मैने मुँह मे ही उसे कुछ बुरा भला कहा
'तभी दिखाई पडा कुछ साफ यारो'
धूल मिट्टी की कुछ हटती जा रही थी
जो माशूक कल थी मेरी जिँदगी
वो आज नई मोटरसाईकल पे
किसी और के संग चली जा रही थी,
वो तो शायद इन बातोँ की आदी थी
लेकिन मेरा दिल बहुत रोया
ऐसा हुआ था मैँ इश्क मे अँधा
कि मैने अपना आप खोया था
टूटे दिल ने एक आवाज दी
कि बेदर्दी !मैँ तो तेरी
बेवफाई सह गया,
किसी और को धोखा मत देना
वो शायद नहीँ सहेगा,
काँटा तेरे प्यार का जिँदगी भर
दिल मेँ मेरे चुभता रहेगा
दिल मेँ ....,
(ये कविता करीब 16-17 साल पहले मैनेँ लिखी होगी,समझ कम थी पर जुनून
था,जैसी भी लिखी थी,वैसी ही आपकी नजर की है)

--
Jagdish disha

Life mantras