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Thursday, May 23, 2013

शायर ''कतील शिफाई''

हालात के कदमोँ पे कलंदर नहीँ गिरता
टूटे भी जो तारा,वो जमीँ पर नहीँ गिरता,
गिरते है बडे शौक से समंद्र मे दरिया
लेकिन किसी दरिया मेँ समंद्र नहीँ गिरता,
समझो वहां फलदार सज़र कोई नहीँ
वो सहन के जिस्म पे कोई पत्थर नहीँ गिरता,
इतना तो हुआ फायदा बारिश की कमी से
इस शहर मेँ अब कोई फिसल कर नहीँ गिरता,
हैरान है कई रोज से ठहरा हुआ पानी
तालाब मेँ अब क्योँ कोई कंकर नहीँ गिरता;

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