मैं अपने पेशे की बदौलत अक्सर लोगों को बहुत नज़दीक से जानने और समझने की कोशिश करता हूँ.सफ़र के दौरान बहुत से विष्यों पर चर्चा होती रहती है,कुछ लोग समाज में हो रहे बदलाव से चिंतित रहते हैं तो कुछ राजनीतिक उठा पटक पर चिंतन करते हैं.
परन्तु ज्यादातर लोग जो मध्यम वर्गीय परिवारों से होते हैं वो लोग अक्सर अपने ही परिवार की उलझनों में फंसे नज़र आते हैं,कोई महंगाई से त्रस्त है तो कोई पारिवारिक सदस्यों की आधुनिकता से दो चार हो रहा है.बहुत से बुजुर्गों को अपने बच्चों के रहन सहन की चिंता सताये हुए है जैसे बहु बेटीयों का संस्कारी न होना और बेटों के कारोबार का कम होना.
हर तरफ चिंता ही चिंता और आक्रोश इन्सानी जिंदगी को घुन की तरह लगा हुआ है.बहुत ही विरले लोग अपनी जिंदगी से खुश व सतुंष्ट नज़र आते हैं.
जितना मैं समझ पाया वो ये कि हम लोगों में से बहुत से ऐसे लोग जो न चाहते हुए भी अनजाने में इस भागती दौड़ती दुनिया के साथ भाग रहे हैं,उन्हे भगवान ने संतुष्टी लायक जीवन दिया भी है पर उसे वो लोग समझ नहीं पा रहे.वो व्यर्थ ही चिंता की चादर कस के ओढे़ हुए हैं,ऐसे लोग किसी के समझाने पर खुद को सही सिद्ध करने के लिए हमेशा अपने पास तर्कों का कवच तैयार रखें रहते हैं.
Sunday, August 31, 2014
दिल ढूँढता है फिर वही...
Saturday, August 23, 2014
Vikas Rajput
Vikas Rajput
कल मैंनॆ भी सोचा था कॊई, श्रृँगारिक गीत लिखूं ,
बावरी मीरा की प्रॆम-तपस्या, राधा की प्रीत लिखूं ,
कुसुम कली कॆ कानों मॆं,मधुर भ्रमर संगीत लिखूं,
जीवन कॆ एकांकी-पन का,कॊई सच्चा मीत लिखूं,
एक भयानक सपनॆं नॆं, चित्र अनॊखा खींच दिया,
श्रृँगार सृजन कॊ मॆरॆ, करुणा कृन्दा सॆ सींच दिया,
यॆ हिंसा का मारा भारत, यह पूँछ रहा है गाँधी सॆ,
कब जन्मॆगा भगतसिंह, इस शोषण की आँधी सॆ,
राज-घाट मॆं रोता गाँधी, अब बॆवश लाचार लिखूंगा !!
दिनकर का वंशज हूं मैं, श्रृँगार नहीं अंगार लिखूंगा !!१!!
चिंतन बदला दर्शन बदला, बदला हर एक चॆहरा,
दही दूध कॆ सींकॊं पर, लगा बिल्लियॊं का पहरा,
इन भ्रष्टाचारों की मंडी मॆं, बर्बाद बॆचारा भारत है,
जलती हॊली मे फंसा हुआ,प्रह्लाद हमारा भारत है,
जीवन का कडुआ सच है, छुपा हुआ इन बातॊं मॆं,
अधिकार चाहिए या शॊषण,चयन तुम्हारॆ हाथॊं मॆं,
जल रही दहॆज की ज्वाला मॆं,नारी की चीख सुनॊं,
जीवन तॊ जीना ही है, क्रांति चुनॊं या भीख चुनॊं,
स्वीकार तुम्हॆं समझौतॆ, मुझकॊ अस्वीकार लिखूंगा !!
बरदाई का वंशज हूं मैं, श्रंगार नहीं अंगार लिखूंगा !!२!!
दिनकर का वंशज हूं मैं...........
उल्टी-सीधी चालें दॆखॊ, नित शाम सबॆरॆ कुर्सी पर,
शासन कर रहॆ दुःशासन,अब चॊर लुटॆरॆ कुर्सी पर,
सत्ता-सुविधाऒं पर अपना, अधिकार जमायॆ बैठॆ हैं,
गांधी बाबा की खादी कॊ, यॆ हथियार बनायॆ बैठॆ हैं,
कपट-कुटी मॆं बैठॆ हैं जॊ, परहित करना क्या जानॆं,
संगीनॊं कॆ सायॆ मॆं यॆ, सरहद का मरना क्या जानॆं,
अनगिनत घॊटालॆ करकॆ भी,जब पा जायॆं बहाली यॆ,
अमर शहीदॊं कॆ ताबूतॊं मॆं, क्यूं ना खायॆं दलाली यॆ,
इन भ्रष्टाचारी गद्दारॊं का, मैं काला किरदार लिखूंगा !!
नज़रुल का वंशज हूं मैं, श्रृँगार नहीं अंगार लिखूंगा !!३!!
दिनकर का वंशज हूं मैं...........
कण-कण मॆं सिसक रही,आज़ाद भगत की अभिलाषा,
अब्दुल हमीद की साँसॆं पूंछें, हैं आज़ादी की परिभाषा,
कब भारत की नारी कब, दामिनी बन कर दमकॆगी,
कब चूडी वालॆ हाँथॊं मॆं, वह तलवार पुरानी चमकेगी,
अपनॆं अपनॆं बॆटॊं कॊ हम, दॆश भक्ति का पाठ पढा दॆं,
जिस माँ की गॊदी खॆलॆ, उसकॆ चरणॊं मॆं भॆंट चढा दॆं,
भारत माँ कॆ बॆटॊं कॊ ही, उसका हर कर्ज चुकाना है,
आऒ मिलकर करॆं प्रतिज्ञा, माँ की लाज बचाना है,
सिसक रही भारत माँ की, मैं बहती अश्रुधार लिखूंगा !!
कवि-भूषण का वंशज हूं मैं,श्रृँगार नहीं अंगार लिखूंगा !!४!!
दिनकर का वंशज हूं मैं...........
Monday, August 18, 2014
Sunday, August 3, 2014
कहानी छोटी तड़प गहरी
बहुत याद आये वो गुज़रा जमाना
आपकी एक झलक पाने को
मेरा तड़प जाना...
कभी दरवाजे पे निगाह तो कभी
धूप में छत पे ही सूख जाना,
तुम्हारे घर की वो
पीछे की सीढियों पे निगाह तो
हर वक्त रहती थी....
तेरे दीदार को कई बार,तरस जाना...
मिलने का मौका एक आध बार मिला
केवल ख़तों से ही काम चलाना...
सच कहूं मैं बिल्कुल अनाडी़ था
कभी हाथ न पकडा,न गले लगाया
लेकिन सच ये भी है कि आपके सिवा
कोई और न था इस दिल में बस पाया...
कितना प्यारे थे तुम मुझे
ये कैसे बतलाऊं,खोल के दिल
कैसे दिखलाऊं,
तुम संग जिंदगी बिताने की चाह थी
तुम बिन जिंदगी को जीना कैसे सिखाऊं...
वक्त की तहों मे लिपट के बेशक्क
मेरा प्यार थोडा दब सा गया था,
लेकिन रूह पर लिखे तेरे नाम को
मैं तो चाह कर भी न मिटा पाऊं...
एक एक पल अपनी बर्बादी का
नहीं भूला,मुझे आज भी याद है,
दर्द जुदाई का बाद मुद्दत के
आज भी बरकरार है ....
अपनी आंखों के सामने अपना प्यार
किसी और का होता,देखता रहा
आखरी मुलाकात तुम छत पे आयी
कुछ बात भी हुई शायद...
फिर तो बस तारों को देखता रहा...
शायद तुम्हे मेरी तड़प का अहसास
इतना न हो,पर खुदा जानता है,
अपनी जिंदगी को खोकर न रोये
ये मेरा दिल है दिलबर...
कहाँ मानता है.................!
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