1, जब मैँ 5 वर्ष का था तब मैँ सोचता था कि मेरे पिता दुनियाँ के सबसे
ताकतवर और समझदार व्यक्ति हैँ ।
2, जब मैँ 10 वर्ष का हुआ तब मैनेँ महसूस किया कि मेरे पिता को दुनियाँ
की हर चीज़ के बारे मेँ ज्ञान है ।
3, जब 15 वर्ष का हुआ तब मैनेँ महसूस किया कि मेरे पिता को दुनियाँ के
साथ चलने के लिए कुछ और ज्ञान की जरुरत है ।
4, जब 20 का हुआ तब महसूस किया कि पिता जी तो किसी और ही दुनियाँ के हैँ
और वे हमारी सोच के साथ नहीँ चल सकते ।
5, और 25 का हुआ तो महसूस हुआ कि पिता जी से किसी भी काम मेँ सलाह लेने
की जरुरत नहीँ है क्योँकि उन्हे हर काम मेँ कमी निकालने की आदत पड गयी है
।
6, जब 30 का हुआ तो महसूस करने लगा कि मेरे पिता को मेरी नक्ल से कुछ-कुछ
समझ आने लगी है ।
7, जब 35 का हुआ तब महसूस करने लगा कि अब उनसे छोटे मोटे फैसलोँ पर सलाह
ली जा सकती है ।
8, जब 40 वर्ष का हुआ तो मैने महसूस किया कि हर तरह के मामले मेँ पिता जी
की सलाह ली जा सकती है ।
9, जब मैँ 50 वर्ष का हुआ तब मैनेँ फैसला किया कि मुझे अपने पिता जी की
सलाह के बिना कुछ नहीँ करना चाहिए क्योँकि मुझे ये ज्ञान हो चुका था कि
मेरे पिता जी दुनियाँ के सबसे समझदार व्यक्ति है,पर....
मैँ अपने इस फैसले पर अमल कर पाता,इस से पहले ही पिता जी इस संसार को
अलविदा कह गऐ और मैँ अपने पिता जी की हर सलाह और तजुर्बे से वंचित रह
गया....!
Jagdish disha
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Wednesday, May 22, 2013
Saturday, May 18, 2013
बातेँ काम की
तुँ कुछ नहीँ,यहाँ क्या है तेरा,
समझ ले गर,बात इतनी तो,
कदम 'दिश्शे' खुदा के घर को,
बढा जान ले आज अभी से;
ये बात इतने ऋषि-मुनी,पीर-पैगंबर,संत साधु दरवेश लोग कई तरीकोँ से कह गये,बार-बार समझाने के पश्चात भी हम मे से कितने ऐसे लोग होँगेँ,जो समझ पाये और जो चल पाये उस रास्ते पे जो खुदा के घर जाता है ।
बहुत फर्क है कोई बात सिर्फ सुनने और समझने मेँ।हम ऐसी बातेँ बडे ध्यान से सुन तो जरुर लेते हैँ,लेकिन,उन्हे अपने जीवन मेँ ढाल नहीँ पाते।
क्या हमे थोडा सा वक्त उस भगवान का नाम लेने के लिए नहीँ निकालना चाहिए जिनकी कृपा से हम जीवन मेँ सभी सुख संसाधनो का उपयोग कर रहे हैँ,आनंद ले रहे है उसकी बनाई हर एक वस्तु का,जो कभी भी हमारी नहीँ थी,मगर, फिर भी उसने हमेँ बख्श दीँ।
ये बात हमे नहीँ भूलनी चाहिये कि इस शरीर मेँ जो आत्मा है,उसका ये पक्का ठिकाना नहीँ है अगर प्रभु ने हमेँ मौका दिया है,कि हम उसको खोज सकेँ और अपनी आत्मा को परमात्मा से मिला सकेँ तो हमेँ इस मौके का सही फायदा लेने की भरपूर कोशिश करनी चाहिए ।
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समझ ले गर,बात इतनी तो,
कदम 'दिश्शे' खुदा के घर को,
बढा जान ले आज अभी से;
ये बात इतने ऋषि-मुनी,पीर-पैगंबर,संत साधु दरवेश लोग कई तरीकोँ से कह गये,बार-बार समझाने के पश्चात भी हम मे से कितने ऐसे लोग होँगेँ,जो समझ पाये और जो चल पाये उस रास्ते पे जो खुदा के घर जाता है ।
बहुत फर्क है कोई बात सिर्फ सुनने और समझने मेँ।हम ऐसी बातेँ बडे ध्यान से सुन तो जरुर लेते हैँ,लेकिन,उन्हे अपने जीवन मेँ ढाल नहीँ पाते।
क्या हमे थोडा सा वक्त उस भगवान का नाम लेने के लिए नहीँ निकालना चाहिए जिनकी कृपा से हम जीवन मेँ सभी सुख संसाधनो का उपयोग कर रहे हैँ,आनंद ले रहे है उसकी बनाई हर एक वस्तु का,जो कभी भी हमारी नहीँ थी,मगर, फिर भी उसने हमेँ बख्श दीँ।
ये बात हमे नहीँ भूलनी चाहिये कि इस शरीर मेँ जो आत्मा है,उसका ये पक्का ठिकाना नहीँ है अगर प्रभु ने हमेँ मौका दिया है,कि हम उसको खोज सकेँ और अपनी आत्मा को परमात्मा से मिला सकेँ तो हमेँ इस मौके का सही फायदा लेने की भरपूर कोशिश करनी चाहिए ।
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