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Sunday, June 30, 2013

खोज 'एक्स-रे' की

एक्स-रे की खोज 'विल्हेम कानरैड रांटजन'(27मार्च1845-10फरवरी1923) ने सन1895 मेँ की थी।
उन्होने इसके लिए विशेष प्रयास नहीँ किया था।वह एक दिन सामानय ढंग से काँच की नली के दोनोँ छोरोँ को तारोँ से जोड कर विद्युत परिपथ पैदा कर रहे थे।इसी दौरान एक घटना घटी।रांटजन के नली को काले कपडे से लपेटने के बावजूद मेज पर हरे रंग की तरंगे झिलमिला रही थीँ।तब आश्चर्य का ठिकाना न रहा,जब देखा गया कि हरे रंग की ये तरंगेँ अपारदर्शक पदार्थोँ को भेद जाती है।इस घटना का प्रायोगिक अध्ययन करने के बाद रांटजन ने इन्हे 'एक्सरेज़' अर्थात 'अज्ञात किरणेँ' का नाम दिया।किन्तु जर्मनी मेँ उनके सम्मान मेँ इनहेँ 'रांटजन किरणेँ' ही कहा जाता है।
'विल्हेम कानरैड रांटजन'(रांटजन क्रुकस)ने जब ये खोज की तब वो जर्मनी के वुटर्सबर्ग विश्वविद्यालय मेँ भौतिकी के प्राध्यापक थे।इस महान खोज के लिए उन्हे सन1909 मेँ भौतिकी मेँ नोबेल पुरस्कार भी दिया गया।
(कुछ अंश बाल केसरी,20अगस्त2011 से लिए गये हैँ)

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Monday, June 17, 2013

'विचार'

एक सुचारु रुप से शासित देश मेँ गरीबी पर हमेँ शर्म करनी चाहिए और विषम रुप से शासित देश मेँ अमीर होने पर शर्म करनी चाहिए ।
कन्फयूशियस (प्रसिद्ध दार्शनिक)

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Tuesday, June 4, 2013

वो लोग जो न भूल पायेँगेँ... !

आज मैँ अपने मनपसंद अदाकार देव आनंद साहिब की एक फिल्म 'जौनी मेरा नाम' टीवी पे देख रहा था ।तो एकाएक मेरा ध्यान पुलिस कमिश्नर का रोल अदा कर रहे अदाकार 'इफ्तिखार खान साहिब' पर ही टिककर रह गया,हालांकि मैँ बैठा देव साहब के लिए ही था ।पर,ऐसे ही ख्याल खान साहिब के इर्द गिर्द ही घूमता रहा,और सोचता रहा कि क्या लाजवाब कलाकार थे वो ।उन्हे किसी भी फिल्म मेँ देखा,तो कभी लगा नहीँ कि वो एक्टिँग कर रहे होँ,उनकी अदाकारी इतनी स्वभाविक लगती थी ।एक और बात,जब भी देखा उन्हे,वो हमेँ एक ही तरह के नज़र आये,वही सिहत,वही आवाज़ ।
कमाल की डायलाग डल्विरी,बेहतरीन कलाकार थे,जितना भी उनका रोल फिल्म मेँ हो,आप उनका काम भूल नहीँ पाते।ज्यादातर हमनेँ उन्हे पुलिस की वर्दी मेँ ही देखा।
इफ्तिखार खान साहिब का जन्म सिआलकोट(पाकिस्तान)का था।22 फरवरी 1920 को जन्मे इस महान अदाकार ने करीब 400 फिल्मोँ मेँ अभिनय किया,जिनमेँ 1 अमेरिकन सीरियल के अलावा,2 अंग्रेज़ी फिल्मेँ Bombay Talkie(70)और city of joy(92) भी थीँ।17साल की उम्र से शुरु उनका फिल्मीँ सफर यादगार रहा,और 4 मार्च 1995 को 75 साल की उम्र मेँ वो इस दुनिया को अलविदा कह गये।

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Sunday, June 2, 2013

( फांसी पर चढ़ने से पूर्व मदन लाल ढीँगरा का वक्तव्य )

मेरा यकीन है कि एक राष्ट्र जिसे विदेशी छुरी की नोक पर झुकाया गया है,वह निरंतर युद्ध की स्थिती मेँ है ।चूंकि खुला युद्ध,निहत्थी प्रजाति के लिए असंभव बना दिया गया है,इसलिए मैनेँ अचानक से हमला किया । चूंकि मुझे बंदूकोँ से वंचित कर दिया गया तो मैनेँ अपनी पिस्तौल निकाली और गोली चलाई ।धन-संपदा से गरीब,लेकिन मस्तिष्क से बुद्धिमान,मेरे जैसे बेटे के पास माँ को देने के लिए कुछ नहीँ है,अपने खून के अलावा,इसलिए मैनेँ उसकी वेदी पर अपने खून का बलिदान दे दिया है ।एकमात्र सबक जिसकी जरुरत वर्तमान मेँ भारत को है,वह है यह सीखना कि कैसे मृत्यृ को प्राप्त हुआ जाए और इसे सिखाने का एकमात्र तरीका है कि हम खुद मृत्यृ को प्राप्त होँ ।मेरी ईश्वर से एक ही प्रार्थना है कि उसी माँ के पास मेरा पुनर्जन्म हो और मैँ इसी पवित्र प्रयोजन के लिए फिर से मरुँ तब तक,जब तक कि प्रयोजन सफल न हो जाए ।
वंदे मातरम ।

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वतन

'अपने वतन को प्रेम करो,वतन जो जगह है,जहां तुम्हारे अभिभावक सोए हैँ,जहाँ तुमने वह भाषा बोली है,जो कि तुम्हारे दिल ने चुनी थी,जहाँ शरमाते हुए तुमने 'प्यार' का पहला शब्द कहा था ।यह वह घर है,जो खुदा ने तुम्हे दिया है,जिसमेँ तुम खुद को मुकम्मल बनाने के प्रयास करते रहो !'
गुसेपी मजीनी (इतालवी क्रांतिकारी)

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Life mantras