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Sunday, January 15, 2017

ਪੰਜਾਬ ਚਾਹੁੰਦੈ ਜਵਾਬਦੇਹ ਸਰਕਾਰ



ਪੰਜਾਬ ‘ਚ ਨਵੀਂ ਸਰਕਾਰ ਕਿਸ ਦੀ ਬਣੂ ਕਿਸ ਦੀ ਨਹੀਂ ਹਾਲੇ ਕੁਝ ਨੀਂ ਕਹਿ ਸਕਦੇ।ਪਰ,ਜੇ ਪਹਿਲਾਂ ਆਲਾ ਹਿਸਾਬ ਲਾਈਏ...ਕਿ ਜੇ ਇਹੀ ਦੋਏ ਪਾਰਟੀਆਂ ਹੁੰਦੀਆਂ ਤਾਂ ਕਿਸੇ ਨੂੰ ਕੋਈ ਸ਼ੱਕ ਨੀਂ ਸੀ ਕਿ ਐਤਕੀ ਕਾਂਗਰਸ ਪਾਰਟੀ ਪੱਕਾ ਜਿੱਤਦੀ।ਵਜ੍ਹਾ ਇਹ ਨਹੀਂ ਕਿ ਕਾਂਗਰਸ ਦਾ ਰਾਜ ਕੋਈ ਬਾਹਲਾ ਵਧੀਆ ਸੀ ਤਾਂ ਉਹ ਜਿੱਤਦੇ,ਬਲਕਿ ਅਸਲ ਵਜ੍ਹਾ ਇਹ ਹੈ ਕਿ ਜਨਤਾ ਅਕਾਲੀਆਂ ਦੀ ਨੀਤੀਆਂ ਨੂੰ ਪਸੰਦ ਏ ਨੀਂ ਕਰਦੀ ਤੇ ਜਿਹੜਾ ਇਹਨਾਂ ਉੱਤੇ ਜਨਤਾ ਦੇ ਪੈਸੇ ਦੀ ਲੁੱਟ-ਘਸੁੱਟ ਕਰਨ ਦਾ,ਲੋਕਾਂ ਦੇ ਕਾਰੋਬਾਰਾਂ ‘ਚ ਜਬਰਦਸਤੀ ਹਿੱਸੇਦਾਰੀ ਕਰਨ ਦਾ,ਨਸ਼ੇ ਨੂੰ ਸ਼ੈ ਦੇਣ ਦਾ ਅਤੇ ਆਮ ਇਨਸਾਨ ਨੂੰ ਰੋਜੀ-ਰੋਟੀ ਤੋਂ ਵੀ ਭੁੱਖਿਆਂ ਮਾਰਨ ਦੇ ਇਲਜਾਮ ਲਗਦੇ ਆਏ ਨੇ...ਇਹਨਾਂ ਦੀ ਹਾਰ ਦੇ ਕਾਰਨ ਬਣਦੇ।
ਪਰ,ਸ਼ਾਇਦ ਪੰਜਾਬ ਦੀ ਸਿਆਸਤ ਵਿੱਚ ਇਹ ਪਹਿਲਾ ਮੌਕਾ ਹੈ ਕਿ ਇਸ ਵਾਰ ਨਵੀਂ ਉੱਭਰੀ ਆਮ ਆਦਮੀ ਪਾਰਟੀ ਨੇ ਇਸ ਇਲੈਕਸ਼ਨ ਨੂੰ ਇੱਕ ਜੰਗ ਵਿੱਚ ਤਬਦੀਲ ਕਰ ਦਿੱਤੈ,ਅਤੇ ਰਿਵਾਇਤੀ ਧੜਿਆਂ ‘ਚ “ਜਵਾਬਦੇਹੀ” ਦਾ ਹਥਿਆਰ ਲੈ ਇੱਕ ਹੋਰ ਮਜਬੂਤ ਧੜਾ ਆ ਵੜਿਐ ਜਿਹੜਾ ਇਹਨਾਂ ਦੋਹਾਂ ਧੜਿਆਂ ਤੋਂ ਵੱਖਰੀ ਵਿਚਾਰਧਾਰਾ ਲੈ ਕੇ ਆਇਐ।
ਮੈਨੂੰ ਲਗਦੈ ਕਿ ਲੋਕ ਨਵੀਂ ਸੋਚ ਨੂੰ ਆਪਣਾ ਯੋਗਦਾਨ ਵੱਧ ਦਿੰਦੇ ਨੇ ਅਤੇ ਪੁਰਾਣੇ ਲਾਰਿਆਂ ਤੇ ਹੁਣ ਬਹੁਤਾ ਭਰੋਸਾ ਨਹੀਂ ਕਰਦੇ,ਕਿਉਂਕਿ ਜਿੱਥੇ ਜਵਾਬਦੇਹੀ ਨਹੀਂ ਓਥੇ ਭਰੋਸਾ ਨਹੀਂ।
ਜਗਦੀਸ਼ ਕੁਮਾਰ ਦਿੱਸ਼ਾ
15/1/2017

Monday, July 4, 2016

ਐਨਾ ਵਿਹਲਾ - Ena Vehla

ਗੀਤ - "ਐਨਾ ਵਿਹਲਾ"

ਗਾਇਕ - ਸਤਿੰਦਰ ਸਰਤਾਜ

ਐਲਬਮ - “ਹਜ਼ਾਰੇ ਵਾਲਾ ਮੁੰਡਾ”

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ਪੈ ਗਿਆ ਕਿੰਨਾ ਗੈਪ
ਸਮਾਂ ਤਾਂ ਖਾ ਗਿਆ ਏ
ਵਟਸਐਪ...ਚੈਟ...
ਕੋਈ ਆ ਗਈ ਵਿੱਦ ਸਨੈਪ
ਜਵਾਨੀ ਕਿੱਧਰ ਚੱਲੀ...
ਕੁਝ ਸੈਲਫ਼ੀ ਖਿੱਚ ਫਸਾ ਲਏ ਨੀਂ
ਤੂੰ ਕੰਮ ਤੋਂ ਬਾਹਰ ਬੁਲਾ ਲਏ ਨੀਂ
ਆ ਕਿਹੜੇ ਕੰਮੀਂ ਲਾ ਲਏ
ਆਪ ਲੁਕ ਬਹਿ ਗਈ ਕੱਲ੍ਹੀ..।

ਐਨਾ ਵਿਹਲਾ ਵੀ ਹੋ ਸਕਦਾ ਏ ਕੋਈ ਬੰਦਾ
ਸਾਰਾ ਦਿਨ ਹੀ ਫੋਨ ਨਾਂ ਆਸਾ ਪਾਸਾ ਵੇਖੇ
ਹੋ ਮਿੱਤਰਾ ਜਿੰਦਗੀ ਏ ਨਜ਼ਰਾਨਾ ਮਾਣ ਹਵਾਵਾਂ ਨੂੰ...
ਮਿੱਤਰਾ ਜਿੰਦਗੀ ਏ ਨਜ਼ਰਾਨਾ ਮਾਣ ਹਵਾਵਾਂ ਨੂੰ
ਜਿੱਧਰੋਂ ਖੁਸ਼ੀ ਭਾਲਦੈਂ ਉਹ ਤਾਂ ਨਿਰੇ ਭੁਲੇਖੇ
....ਭੁਲੇਖੇ....ਨਿਰੇ ਭੁਲੇਖੇ...

ਸੁਣ ਸਰਤਾਜ ਕੀ ਕਹਿੰਦਾ ਮਿੱਤਰਾ
ਨੋਟਿਸ ਕਿਉਂ ਨੀਂ ਲੈਂਦਾ -2

ਅੱਖੀਆਂ ਬਣੀਆਂ ਸੀ ਜੋ ਮਾਨਣ ਸੱਜਰਿਆਂ ਫੁੱਲਾਂ ਨੂੰ
ਜਾਂ ਫੇਰ ਅੱਧੀ ਰਾਤ ਨੂੰ ਵੇਖਣ ਛੱਤ ਤੇ ਤਾਰੇ
ਓ ਤੂੰ ਤਾਂ ਆਪਣੀ ਤਲੀ ਦੇ ਉੱਪਰ ਨਿਗ੍ਹਾ ਟਿਕਾਈਆਂ ਨੇ...
ਤੂੰ ਤਾਂ ਆਪਣੀ ਤਲੀ ਦੇ ਉੱਪਰ ਨਿਗ੍ਹਾ ਟਿਕਾਈਆਂ ਨੇ
ਓਏ ਤੇਰੇ ਉਪਰੋਂ ਗੁਜਰੀ ਜਾਂਦੇ ਬੱਦਲ ਭਾਰੇ
...ਨਜ਼ਾਰੇ...ਹੁਲਾਰੇ...

ਸੂਰਜ ਚੜ੍ਹਦਾ ਲਹਿੰਦਾ ਵੇ ਤੂੰ ਨੋਟਿਸ ਕਿਉਂ ਨੀਂ ਲੈਂਦਾ - 2

ਤੈਨੂੰ ਖੁਦ ਵੀ ਲਗਦਾ ਜਿੰਦਗੀ ਵਿੱਚ ਕੁਝ ਕੀਤਾ ਤੂੰ
ਇਹਨਾਂ ਉਂਗਲੀਆਂ ਨਾਲ ਜੇ ਕੋਈ ਤੂੰ ਸਾਜ਼ ਵਜਾਉਂਦਾ
ਆਹ ਤੇਰੀ ਵਟਸਐਪ ਨੇ ਤੇਜ਼ੀ ਖਾ ਲਈ ਉਂਗਲਾਂ ਦੀ...
ਤੇਰੀ ਵਟਸਐਪ ਨੇ ਤੇਜ਼ੀ ਖਾ ਲਈ ਉਂਗਲਾਂ ਦੀ
ਬੈਠਾ ਤਕਦਾ ਰਹਿੰਦਾ ਕਦ ਰਿਪਲਾਈ ਆਉਂਦਾ
...ਆਉਂਦਾ...ਰਿਪਲਾਈ ਆਉਂਦਾ...

ਦਿਲ ਟਿਕ ਕੇ ਨੀਂ ਬਹਿੰਦਾ ਏਹ ਸਕਰੀਨ ਨੂੰ ਤੱਕਦਾ ਰਹਿੰਦਾ -2

ਆਹ ਨੀਂ ਚੱਲਣਾ ਨਾਲੇ ਚੈਟ ਤੇ ਨਾਲ ਡਰਾਇਵਰੀਆਂ...
ਆਹ ਨੀਂ ਚੱਲਣਾ ਨਾਲੇ ਚੈਟ ਤੇ ਨਾਲ ਡਰਾਇਵਰੀਆਂ
ਰੋਕਣ ਵਾਲਿਆਂ ਨੂੰ ਤੂੰ ਕਹਿੰਨੈ ਮਾਮੇ - ਸਾਲੇ
ਤੇਰਾ ਛੜੇ ਛਾਂਟ ਦਾ ਕੀ ਐ ਆਪੇ ਭੁਗਤ ਲਵੀਂ...
ਤੇਰਾ ਛੜੇ ਛਾਂਟ ਦਾ ਕੀ ਐ ਆਪੇ ਭੁਗਤ ਲਵੀਂ
ਪਰ ਇਹਨਾਂ ਸੜਕਾਂ ਤੋਂ ਈ ਜਾਂਦੇ ਬੱਚਿਆਂ ਵਾਲੇ
...ਵਾਲੇ...ਜੀ ਬੱਚਿਆਂ ਵਾਲੇ...

ਫਰਕ ਬੜਾ ਹੀ ਪੈਂਦਾ ਜਦ ਕੋਈ ਬੇਕਸੂਰ ਦੁੱਖ ਸਹਿੰਦਾ -2
ਦਿਲ ਟਿਕ ਕੇ ਨੀਂ ਬਹਿੰਦਾ ਇਹ ਸਕਰੀਨ ਨੂੰ ਤੱਕਦਾ ਰਹਿੰਦਾ -2
ਸੁਣ ਸਰਤਾਜ ਕੀ ਕਹਿੰਦਾ ਮਿੱਤਰਾ ਨੋਟਿਸ ਕਿਉਂ ਨੀਂ ਲੈਂਦਾ -2

Sunday, August 31, 2014

दिल ढूँढता है फिर वही...

मैं अपने पेशे की बदौलत अक्सर लोगों को बहुत नज़दीक से जानने और समझने की कोशिश करता हूँ.सफ़र के दौरान बहुत से विष्यों पर चर्चा होती रहती है,कुछ लोग समाज में हो रहे बदलाव से चिंतित रहते हैं तो कुछ राजनीतिक उठा पटक पर चिंतन करते हैं.
परन्तु ज्यादातर लोग जो मध्यम वर्गीय परिवारों से होते हैं वो लोग अक्सर अपने ही परिवार की उलझनों में फंसे नज़र आते हैं,कोई महंगाई से त्रस्त है तो कोई पारिवारिक सदस्यों की आधुनिकता से दो चार हो रहा है.बहुत से बुजुर्गों को अपने बच्चों के रहन सहन की चिंता सताये हुए है जैसे बहु बेटीयों का संस्कारी न होना और बेटों के कारोबार का कम होना.
   हर तरफ चिंता ही चिंता और आक्रोश इन्सानी जिंदगी को घुन की तरह लगा हुआ है.बहुत ही विरले लोग अपनी जिंदगी से खुश व सतुंष्ट नज़र आते हैं.
  जितना मैं समझ पाया वो ये कि हम लोगों में से बहुत से ऐसे लोग जो न चाहते हुए भी अनजाने में इस भागती दौड़ती दुनिया के साथ भाग रहे हैं,उन्हे भगवान ने संतुष्टी लायक जीवन दिया भी है पर उसे वो लोग समझ नहीं पा रहे.वो व्यर्थ ही चिंता की चादर कस के ओढे़ हुए हैं,ऐसे लोग किसी के समझाने पर खुद को सही सिद्ध करने के लिए हमेशा अपने पास तर्कों का कवच तैयार रखें रहते हैं.

Tuesday, May 20, 2014

नहीं व्यर्थ हमारा चिंतन

इस बात में कोई शक्क नहीं कि हम सभी अपने भारत देश से बहुत प्यार करते हैं व सभी के मन में अपने वतन के प्रति बेहद स्नेहभाव है|इस बात की गवाह है वो चिंता,जो हर व्यक्ति अपने तरीके से देशहित्त के लिए घरों,चौपालों व अपने मित्रों से व्यक्त करता है|ये निस्वार्थ बातचीत हमारे देशप्रेम को साबित करती है,भले ही ये बातें हमें अपने मनोभाव के अनुरूप कोई सशक्त निर्णय लेने की ताकत नहीं देतीं मगर ये चिंतन हमें उस नेतृत्व की और आक्रषि्त करता है जो हमारी सोच पर पहरा देता नज़र आये|आहिस्ता-आहिस्ता ये बातें मुद्दों का रूप ले,विपक्षी राजनीतिक पार्टीयों की राजनीति को गति प्रदान करती हैं|गली मुहल्लों मे होने वाली ये बातचीत बडे स्तर पे होने वाले बदलाव में सहायक सिद्ध होती है,इसका परिणाम अचानक हुए बदलाव में दिखायी देता है,जिसकी शायद हमें आस तक नहीं होती|

Saturday, November 30, 2013

मन जीतै...जग जीत।

मन की भी अपनी मौज है।कभी लगता है कि सब व्यर्थ है...और कभी सबकुछ अपना बनाने की होड़ में भागने लगता है।इस मन को समझने की कोशिश सदीयों से जारी है..ऋषि मुनी,ज्ञानी...हर कोई अपने अनुभव के अनुसार जनमानस के कल्याण हेतु अलग-अलग तरीकों से लोगों को इस विष्य पर समझाते रहे हैं।लेकिन,हर जीव के मन की अवस्था अलग है..और उसी अवस्था के परिणाम भी अलग हैं।जहाँ तक मेरी समझ काम करती है..मैं मानता हूँ कि मन अगर किसी सही काम में लग जाये तो इससे बेहतर कोई साथी नहीं है।अगर हमारा जीवन अव्यवस्थित तरीके से जीया जा रहा है तो परिणाम भी सार्थक नहीं होंगें।सबसे पहले हमें अपने जीवन को जीने के ढ़ंग को बदलना चाहिए...शुरुआत में अपने जीवन लक्षय को निर्धारित करना,फिर तय लक्षय की पूर्णता हेतु अपने प्रयासों को..कोशिश रुपी धागे में पिरोना और फिर अपना तन-मन पूरी तरह उसी कार्य को करने मे झोंक देना..ताकि हमें जीने का मक्सद मिल सके।फिर अपने आप घटने वाली घटनाओं से आपका अपना मन सही दिशा में सक्रिय हो जायेगा और रम जायेगा।आहिस्ता-2 सब सवालों से रुबरु आपका मन खुद जवाब ढूंढने में सक्षम हो जायेगा व व्यर्थ छूटता चला जायेगा।

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Tuesday, September 3, 2013

डोल रहा विश्वास

आज जो हालात भारत मेँ कन्या भ्रूण और नाबालिग लडकीयों के यौन शोषण को
लेकर बने हुए हैं वो गहन चिंता का विष्य होने के साथ साथ भारत की महान
संस्कृति की साख पर बदनुमा दाग़ हैं।
और उसपे त्रासदी ये भी है कि जिस भारत वर्ष को आध्यात्मिक देश का दर्ज़ा
हासिल है उस भूमि पर जो ये घिनौने कृत्य अंजाम दिये जा रहे हैं उन्मे आम
आदमी से ज्यादा साधु-संतों का शुमार होना निहायत ही शर्म की बात है।साधु
संत याँ आध्यात्मिक गुरुओँ का नाम ऐसे प्रकरणोँ में आना समाज में खत्म हो
रही नैतिकता का वो रुप हैं जिसके आगे हम और इन्सानों से किसी प्रकार की
नैतिकता की आस लगायें तो बेमानी होगी।क्योंकि हमारे पूर्वजों के समय से
जो संस्कारों की शिक्षा का हवाला इस देश के बच्चों को दिया जाता रहा है
उन संसकारों के मंदिर में साधु महात्माओं का स्थान शीर्ष पर है और भगवान
स्वरूप उन्हे मान्यता प्रदान की गयी है:
तीन लोक नौ खंड में,गुरु से बडा न कोये,
कर्ता करे न कर,सके गुरु करे सो होये;
पिछ्ले कुछ समय से ऐसी वारदातें लोगों के विश्वास को तार तार कर रहीं हैं।
मेरी व्यक्तिगत राय है कि इन सबके पीछे मौजूद पुख्ता कारण जो है वो ये कि
साधु-संत,और गुरुजनों की जीवनशैली अब वैसी न होना जैसी का पुरानें समयोँ
में वर्णन मिलता है।
देखिये,सुख सुविधायें तो उन पुरानें वक्तों में भी बहुत थीं,जब उन्हें
त्याग लोग सन्यासी बनते थे।परमात्मा की खोज में सब सुविधायें छोडछाड वो
आश्रमों में कठिन परिस्थितियों को अपनाकर अपना जीवन व्यतीत करते थे,और
मुक्ति की खोज और समस्त जीवों के कल्याण हेतू अपना जीवन अर्पण कर देते
थे।
क्या आज कोई भी संत आपको उस कोटि का दिखाई पडता है?मेरी जिंदगी में तो
वैसा न मैनें किसी से सुना और न खुद देखा है।आजकल के ज्यादातर गुरु बातें
तो बहुत उँचीं करते हैं,लेकिन उनको न तो वो अपने भक्तों के जीवन में उतार
पाते हैं और न हीं खुद उन बातों पर खरे उतरते हैं।
भक्तों की बेशुमार भीड,करोडों रुपयों की लागत से तैयार आश्रम,खुद का
अत्याधुनिक सुविधायें जैसे महंगी कारें,मोबाइल,एसी कुटियायें और देश
विदेश की यात्रायों से लैस होना,एक प्रकार का 'भोग' ही तो
हैं।भोग-विलास,अंहकार और लालच जैसी जिन बुरी आदतों को छोड साधु का चोला
पहना जाता है,उन्ही को वो दोबारा से ग्रहण कर,किस तरह का भला जनता का कर
सकते है?इन बातों से मैं,आप सभी भलीभांति परिचित्त हैं।

Tuesday, July 30, 2013

तुम मुक्त हो

एक ही जगत है-यही जगत।फिर चाहो नर्क बना लो,चाहे स्वर्ग।जगत मात्र एक अवसर है।कोरी किताब-क्या तुम लिखोगे,ये तुम पर निर्भर है।और केवल तुम पर।किसी और की कोई जिम्मेवारी नहीँ है।नर्क मेँ जीना हो नर्क बना लो-स्वर्ग मेँ जीना हो स्वर्ग बना लो-तुम्हारे हाथोँ का ही सारा निर्माण है।यहाँ सब मौजूद है।युद्ध करना हो तो युद्ध और प्रेम की छाया मेँ जीना हो तो प्रेम की छाया।शांति के फूल
उगाने होँ तो कोई रोकता नहीँ,निर्वाण के दीये जलाने होँ तो कोई बुझाता नहीँ-और अगर जख्म ही छाती मेँ लगाने होँ तो कोई हाथ रोकने आयेगा नहीँ।
तुम मुक्त हो।तुम स्वतंत्र हो।मनुष्य की यही महिमा है,यही उसका विषाद भी।विषाद,कि मनुष्य स्वतंत्र है;गलत करने को भी स्वतंत्र है।स्वतन्त्रता मेँ गलत करने की स्वतन्त्रता सम्मिलित है।अगर ठीक करने की ही स्वतन्त्रता होती तो उसे स्वतन्त्रता ही क्या कहते।स्वतन्त्रता का अर्थ ही होता है,गलत होने की स्वतन्त्रता भी है।चाहो तो मिटा लो,चाहे तो बना लो।चाहो तो गिर जाओ,मिट्टी और
कीचड मेँ हो जाओ और चाहो तो कमल बन जाओ।
जीवन एक कोरा अवसर है-बिल्कुल कोरा अवसर।जैसे कोरा कैनवास हो और चित्रकार उस पर चित्र उभारे;कि अन-गढ़ पत्थर हो,कि मूर्तीकार उसमेँ मूर्ती निखारे।शब्द उपलब्ध है;चाहो गालीयाँ बना लो और चाहे गीत।इस बात को जितने गहरे मे उतर जाने दो हृदय मे,उतना अच्छा है। भूलकर भी मत सोचना कि कोई तुम्हारे भाग्य का निर्माण कर रहा है।उस बात मे बडा खतरा है।फिर आदमी अवश हो जाता है।फिर जो हो रहा है,हो
रहा है।फिर सहने के सिवाय कोई उपाय नहीँ।फिर आदमी मिट्टी का लौँदा हो जाता है;उसके प्राण सूख जाते हैँ।उसमेँ जीवन की धार नहीँ बहती।चुनौतियोँ को अंगीकार करने की सामर्थ्य खो जाती है।और जहां चुनौतियोँ को अंगीकार करने की सामर्थ्य नही,वहां आत्मा का जन्म नहीँ।आत्मा जनमती है,चुनौतियोँ के स्वीकार करने से।तुफानोँ मेँ पैदा होती है आत्मा।आंधियोँ-अंधड़ोँ मेँ पैदा होती है आत्मा।
(भगवान श्री रजनीश-ओशो)

Monday, June 17, 2013

'विचार'

एक सुचारु रुप से शासित देश मेँ गरीबी पर हमेँ शर्म करनी चाहिए और विषम रुप से शासित देश मेँ अमीर होने पर शर्म करनी चाहिए ।
कन्फयूशियस (प्रसिद्ध दार्शनिक)

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Sunday, June 2, 2013

( फांसी पर चढ़ने से पूर्व मदन लाल ढीँगरा का वक्तव्य )

मेरा यकीन है कि एक राष्ट्र जिसे विदेशी छुरी की नोक पर झुकाया गया है,वह निरंतर युद्ध की स्थिती मेँ है ।चूंकि खुला युद्ध,निहत्थी प्रजाति के लिए असंभव बना दिया गया है,इसलिए मैनेँ अचानक से हमला किया । चूंकि मुझे बंदूकोँ से वंचित कर दिया गया तो मैनेँ अपनी पिस्तौल निकाली और गोली चलाई ।धन-संपदा से गरीब,लेकिन मस्तिष्क से बुद्धिमान,मेरे जैसे बेटे के पास माँ को देने के लिए कुछ नहीँ है,अपने खून के अलावा,इसलिए मैनेँ उसकी वेदी पर अपने खून का बलिदान दे दिया है ।एकमात्र सबक जिसकी जरुरत वर्तमान मेँ भारत को है,वह है यह सीखना कि कैसे मृत्यृ को प्राप्त हुआ जाए और इसे सिखाने का एकमात्र तरीका है कि हम खुद मृत्यृ को प्राप्त होँ ।मेरी ईश्वर से एक ही प्रार्थना है कि उसी माँ के पास मेरा पुनर्जन्म हो और मैँ इसी पवित्र प्रयोजन के लिए फिर से मरुँ तब तक,जब तक कि प्रयोजन सफल न हो जाए ।
वंदे मातरम ।

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वतन

'अपने वतन को प्रेम करो,वतन जो जगह है,जहां तुम्हारे अभिभावक सोए हैँ,जहाँ तुमने वह भाषा बोली है,जो कि तुम्हारे दिल ने चुनी थी,जहाँ शरमाते हुए तुमने 'प्यार' का पहला शब्द कहा था ।यह वह घर है,जो खुदा ने तुम्हे दिया है,जिसमेँ तुम खुद को मुकम्मल बनाने के प्रयास करते रहो !'
गुसेपी मजीनी (इतालवी क्रांतिकारी)

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Wednesday, May 29, 2013

लक्ष्य साधो,तभी मिलेगी सफलता

किसी एक विचार को अपने जीवन का लक्षय बनाओ।कुविचारोँ का त्याग कर केवल उसी विचार के बारे मेँ सोचो।तुम पाओगे कि सफलता तुम्हारे कदम चूम रही है।
-स्वामी विवेकानंद

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Sunday, May 26, 2013

हमारी भूल

मुझे राजनीती की ज्यादा समझ तो नहीँ है,लेकिन इस विष्य पर बात करते कई लोगोँ को सुना है,और अब तो इस बारे मेँ मैँ अपनी भी एक राय रखने लगा हुँ ।अपनी समझ के मुताबिक जितना समझ पाया,वो ये कि ये क्षेत्र उन लोगोँ के लिए तो बिल्कुल ही नहीँ है जो अपना जीवन अपने आदर्शोँ के मुताबिक जीना चाहते होँ और समाज मेँ उन्ही उसूलोँ के सहारे कोई ठोस परिवर्तन लाना चाहते होँ।
राजनीती मेँ कोई भी व्यक्ति जो लोगोँ की आवाज बन कर आगे आता है,या तो सोच समझ कर बनाई रणनीती के द्वारा वो अपने भविष्य को अधिक प्राथमिकता देते हुए लोगोँ के हितोँ की रक्षा के साथ समझोता कर लेता है और हाथ मिला लेता है राजनीती के उन दलालोँ से जो जनता के हितोँ को दबाने का धंधा करते हैँ अपने उपर बैठे आकाओँ को खुश रखने मेँ हर प्रकार से सक्रिय रहते हैँ।

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Thursday, May 16, 2013

है कोई दोस्त,आपका भी ?

आप मैँ या कोई भी इन्सान ऐसा नहीँ जिसे जिंदगी मेँ किसी मुसिबत का सामना न करना पडा हो ।मुसिबत चाहे कैसी भी हो,अपनी खुद की सिहत से जुडी,कारोबार से सबंधित याँ घरेलू प्रकार की कोई परेशानी।
जब भी ऐसी किसी वजह से मन परेशान होता है तो सबसे ज्यादा जो सहारा व होँसला किसी दोस्त मित्र के साथ की बात से मिल सकता है,वैसा किसी सगे सबंधी के पास होने से भी महसूस नहीँ होता।
वजह ये कि दोस्त हमारी खुशी व तकलीफोँ से सीधे जुडे होते हैँ क्योँ कि हम उनसे अपने सबंधियोँ की तुलना मेँ निरंतर बातचीत के द्वारा गहराई से जुडे रहते हैँ और उनका रोल ज्यादा अहम बना रहता है इसलिए भी कि बहुत सी निजी बातेँ हर कोई अपने दोस्तोँ से ही शेयर करके सुरक्षित महसूस करता है।
इसलिए दोस्ती के इस रिश्ते को सदा मधुर बनायेँ रखेँ।
भाई बहन,सबंधी हमे भगवान से बिन मांगे मिलते हैँ,मगर दोस्त हम अपनी मर्जी से चुनते हैँ,जो दिल से अच्छा हो,आपके विचारोँ की कद्र करे और आपके जज्बात को समझता हो।
इसलिए आदर्श दोस्तोँ का साथ निभायेँ,खुद भी आदर्श मित्र बनेँ।
'युँ तो सब हैँ,रिश्ते जहाँ मे,
रिश्ता दोस्ती का,ऐ खुदा !
इन्सान को बख्शी तेरी
है सबसे अच्छी सौगात';

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Life mantras