Sunday, January 15, 2017
ਪੰਜਾਬ ਚਾਹੁੰਦੈ ਜਵਾਬਦੇਹ ਸਰਕਾਰ
Monday, July 4, 2016
ਐਨਾ ਵਿਹਲਾ - Ena Vehla
Sunday, August 31, 2014
दिल ढूँढता है फिर वही...
मैं अपने पेशे की बदौलत अक्सर लोगों को बहुत नज़दीक से जानने और समझने की कोशिश करता हूँ.सफ़र के दौरान बहुत से विष्यों पर चर्चा होती रहती है,कुछ लोग समाज में हो रहे बदलाव से चिंतित रहते हैं तो कुछ राजनीतिक उठा पटक पर चिंतन करते हैं.
परन्तु ज्यादातर लोग जो मध्यम वर्गीय परिवारों से होते हैं वो लोग अक्सर अपने ही परिवार की उलझनों में फंसे नज़र आते हैं,कोई महंगाई से त्रस्त है तो कोई पारिवारिक सदस्यों की आधुनिकता से दो चार हो रहा है.बहुत से बुजुर्गों को अपने बच्चों के रहन सहन की चिंता सताये हुए है जैसे बहु बेटीयों का संस्कारी न होना और बेटों के कारोबार का कम होना.
हर तरफ चिंता ही चिंता और आक्रोश इन्सानी जिंदगी को घुन की तरह लगा हुआ है.बहुत ही विरले लोग अपनी जिंदगी से खुश व सतुंष्ट नज़र आते हैं.
जितना मैं समझ पाया वो ये कि हम लोगों में से बहुत से ऐसे लोग जो न चाहते हुए भी अनजाने में इस भागती दौड़ती दुनिया के साथ भाग रहे हैं,उन्हे भगवान ने संतुष्टी लायक जीवन दिया भी है पर उसे वो लोग समझ नहीं पा रहे.वो व्यर्थ ही चिंता की चादर कस के ओढे़ हुए हैं,ऐसे लोग किसी के समझाने पर खुद को सही सिद्ध करने के लिए हमेशा अपने पास तर्कों का कवच तैयार रखें रहते हैं.
Tuesday, May 20, 2014
नहीं व्यर्थ हमारा चिंतन
इस बात में कोई शक्क नहीं कि हम सभी अपने भारत देश से बहुत प्यार करते हैं व सभी के मन में अपने वतन के प्रति बेहद स्नेहभाव है|इस बात की गवाह है वो चिंता,जो हर व्यक्ति अपने तरीके से देशहित्त के लिए घरों,चौपालों व अपने मित्रों से व्यक्त करता है|ये निस्वार्थ बातचीत हमारे देशप्रेम को साबित करती है,भले ही ये बातें हमें अपने मनोभाव के अनुरूप कोई सशक्त निर्णय लेने की ताकत नहीं देतीं मगर ये चिंतन हमें उस नेतृत्व की और आक्रषि्त करता है जो हमारी सोच पर पहरा देता नज़र आये|आहिस्ता-आहिस्ता ये बातें मुद्दों का रूप ले,विपक्षी राजनीतिक पार्टीयों की राजनीति को गति प्रदान करती हैं|गली मुहल्लों मे होने वाली ये बातचीत बडे स्तर पे होने वाले बदलाव में सहायक सिद्ध होती है,इसका परिणाम अचानक हुए बदलाव में दिखायी देता है,जिसकी शायद हमें आस तक नहीं होती|
Saturday, November 30, 2013
मन जीतै...जग जीत।
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Tuesday, September 3, 2013
डोल रहा विश्वास
लेकर बने हुए हैं वो गहन चिंता का विष्य होने के साथ साथ भारत की महान
संस्कृति की साख पर बदनुमा दाग़ हैं।
और उसपे त्रासदी ये भी है कि जिस भारत वर्ष को आध्यात्मिक देश का दर्ज़ा
हासिल है उस भूमि पर जो ये घिनौने कृत्य अंजाम दिये जा रहे हैं उन्मे आम
आदमी से ज्यादा साधु-संतों का शुमार होना निहायत ही शर्म की बात है।साधु
संत याँ आध्यात्मिक गुरुओँ का नाम ऐसे प्रकरणोँ में आना समाज में खत्म हो
रही नैतिकता का वो रुप हैं जिसके आगे हम और इन्सानों से किसी प्रकार की
नैतिकता की आस लगायें तो बेमानी होगी।क्योंकि हमारे पूर्वजों के समय से
जो संस्कारों की शिक्षा का हवाला इस देश के बच्चों को दिया जाता रहा है
उन संसकारों के मंदिर में साधु महात्माओं का स्थान शीर्ष पर है और भगवान
स्वरूप उन्हे मान्यता प्रदान की गयी है:
तीन लोक नौ खंड में,गुरु से बडा न कोये,
कर्ता करे न कर,सके गुरु करे सो होये;
पिछ्ले कुछ समय से ऐसी वारदातें लोगों के विश्वास को तार तार कर रहीं हैं।
मेरी व्यक्तिगत राय है कि इन सबके पीछे मौजूद पुख्ता कारण जो है वो ये कि
साधु-संत,और गुरुजनों की जीवनशैली अब वैसी न होना जैसी का पुरानें समयोँ
में वर्णन मिलता है।
देखिये,सुख सुविधायें तो उन पुरानें वक्तों में भी बहुत थीं,जब उन्हें
त्याग लोग सन्यासी बनते थे।परमात्मा की खोज में सब सुविधायें छोडछाड वो
आश्रमों में कठिन परिस्थितियों को अपनाकर अपना जीवन व्यतीत करते थे,और
मुक्ति की खोज और समस्त जीवों के कल्याण हेतू अपना जीवन अर्पण कर देते
थे।
क्या आज कोई भी संत आपको उस कोटि का दिखाई पडता है?मेरी जिंदगी में तो
वैसा न मैनें किसी से सुना और न खुद देखा है।आजकल के ज्यादातर गुरु बातें
तो बहुत उँचीं करते हैं,लेकिन उनको न तो वो अपने भक्तों के जीवन में उतार
पाते हैं और न हीं खुद उन बातों पर खरे उतरते हैं।
भक्तों की बेशुमार भीड,करोडों रुपयों की लागत से तैयार आश्रम,खुद का
अत्याधुनिक सुविधायें जैसे महंगी कारें,मोबाइल,एसी कुटियायें और देश
विदेश की यात्रायों से लैस होना,एक प्रकार का 'भोग' ही तो
हैं।भोग-विलास,अंहकार और लालच जैसी जिन बुरी आदतों को छोड साधु का चोला
पहना जाता है,उन्ही को वो दोबारा से ग्रहण कर,किस तरह का भला जनता का कर
सकते है?इन बातों से मैं,आप सभी भलीभांति परिचित्त हैं।
Tuesday, July 30, 2013
तुम मुक्त हो
उगाने होँ तो कोई रोकता नहीँ,निर्वाण के दीये जलाने होँ तो कोई बुझाता नहीँ-और अगर जख्म ही छाती मेँ लगाने होँ तो कोई हाथ रोकने आयेगा नहीँ।
तुम मुक्त हो।तुम स्वतंत्र हो।मनुष्य की यही महिमा है,यही उसका विषाद भी।विषाद,कि मनुष्य स्वतंत्र है;गलत करने को भी स्वतंत्र है।स्वतन्त्रता मेँ गलत करने की स्वतन्त्रता सम्मिलित है।अगर ठीक करने की ही स्वतन्त्रता होती तो उसे स्वतन्त्रता ही क्या कहते।स्वतन्त्रता का अर्थ ही होता है,गलत होने की स्वतन्त्रता भी है।चाहो तो मिटा लो,चाहे तो बना लो।चाहो तो गिर जाओ,मिट्टी और
कीचड मेँ हो जाओ और चाहो तो कमल बन जाओ।
जीवन एक कोरा अवसर है-बिल्कुल कोरा अवसर।जैसे कोरा कैनवास हो और चित्रकार उस पर चित्र उभारे;कि अन-गढ़ पत्थर हो,कि मूर्तीकार उसमेँ मूर्ती निखारे।शब्द उपलब्ध है;चाहो गालीयाँ बना लो और चाहे गीत।इस बात को जितने गहरे मे उतर जाने दो हृदय मे,उतना अच्छा है। भूलकर भी मत सोचना कि कोई तुम्हारे भाग्य का निर्माण कर रहा है।उस बात मे बडा खतरा है।फिर आदमी अवश हो जाता है।फिर जो हो रहा है,हो
रहा है।फिर सहने के सिवाय कोई उपाय नहीँ।फिर आदमी मिट्टी का लौँदा हो जाता है;उसके प्राण सूख जाते हैँ।उसमेँ जीवन की धार नहीँ बहती।चुनौतियोँ को अंगीकार करने की सामर्थ्य खो जाती है।और जहां चुनौतियोँ को अंगीकार करने की सामर्थ्य नही,वहां आत्मा का जन्म नहीँ।आत्मा जनमती है,चुनौतियोँ के स्वीकार करने से।तुफानोँ मेँ पैदा होती है आत्मा।आंधियोँ-अंधड़ोँ मेँ पैदा होती है आत्मा।
(भगवान श्री रजनीश-ओशो)
Monday, June 17, 2013
'विचार'
कन्फयूशियस (प्रसिद्ध दार्शनिक)
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Sunday, June 2, 2013
( फांसी पर चढ़ने से पूर्व मदन लाल ढीँगरा का वक्तव्य )
वंदे मातरम ।
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वतन
गुसेपी मजीनी (इतालवी क्रांतिकारी)
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Wednesday, May 29, 2013
लक्ष्य साधो,तभी मिलेगी सफलता
-स्वामी विवेकानंद
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Sunday, May 26, 2013
हमारी भूल
राजनीती मेँ कोई भी व्यक्ति जो लोगोँ की आवाज बन कर आगे आता है,या तो सोच समझ कर बनाई रणनीती के द्वारा वो अपने भविष्य को अधिक प्राथमिकता देते हुए लोगोँ के हितोँ की रक्षा के साथ समझोता कर लेता है और हाथ मिला लेता है राजनीती के उन दलालोँ से जो जनता के हितोँ को दबाने का धंधा करते हैँ अपने उपर बैठे आकाओँ को खुश रखने मेँ हर प्रकार से सक्रिय रहते हैँ।
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Thursday, May 16, 2013
है कोई दोस्त,आपका भी ?
जब भी ऐसी किसी वजह से मन परेशान होता है तो सबसे ज्यादा जो सहारा व होँसला किसी दोस्त मित्र के साथ की बात से मिल सकता है,वैसा किसी सगे सबंधी के पास होने से भी महसूस नहीँ होता।
वजह ये कि दोस्त हमारी खुशी व तकलीफोँ से सीधे जुडे होते हैँ क्योँ कि हम उनसे अपने सबंधियोँ की तुलना मेँ निरंतर बातचीत के द्वारा गहराई से जुडे रहते हैँ और उनका रोल ज्यादा अहम बना रहता है इसलिए भी कि बहुत सी निजी बातेँ हर कोई अपने दोस्तोँ से ही शेयर करके सुरक्षित महसूस करता है।
इसलिए दोस्ती के इस रिश्ते को सदा मधुर बनायेँ रखेँ।
भाई बहन,सबंधी हमे भगवान से बिन मांगे मिलते हैँ,मगर दोस्त हम अपनी मर्जी से चुनते हैँ,जो दिल से अच्छा हो,आपके विचारोँ की कद्र करे और आपके जज्बात को समझता हो।
इसलिए आदर्श दोस्तोँ का साथ निभायेँ,खुद भी आदर्श मित्र बनेँ।
'युँ तो सब हैँ,रिश्ते जहाँ मे,
रिश्ता दोस्ती का,ऐ खुदा !
इन्सान को बख्शी तेरी
है सबसे अच्छी सौगात';
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ਗੀਤ - ਹਮਜ਼ਾ ਗਾਇਕ - ਸਤਿੰਦਰ ਸਰਤਾਜ ਐਲਬਮ - ਹਮਜ਼ਾ ********* ਓ ਹਮਜ਼ਾ...ਓ ਹਮਜ਼ਾ ਹਮਜ਼ਾ...ਹੱਕ ਹਕੂਕ ਵਸੀਲਾ,...
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ਪੰਜਾਬ ‘ਚ ਨਵੀਂ ਸਰਕਾਰ ਕਿਸ ਦੀ ਬਣੂ ਕਿਸ ਦੀ ਨਹੀਂ ਹਾਲੇ ਕੁਝ ਨੀਂ ਕਹਿ ਸਕਦੇ।ਪਰ,ਜੇ ਪਹਿਲਾਂ ਆਲਾ ਹਿਸਾਬ ਲਾਈਏ...ਕਿ ਜੇ ਇਹੀ ਦੋਏ ਪਾਰਟੀਆਂ ਹੁੰਦੀਆਂ ਤਾਂ ਕਿਸ...
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"जिंदगी में आगे बढ़ने के लिए आपकी इच्छाशक्ति मजबूत होनी चाहिए" किसी के कहे ये शब्द कब जिंदगी का अहम सबक बन गये,याद नहीं ! लेकिन म...







