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Saturday, November 30, 2013

मन जीतै...जग जीत।

मन की भी अपनी मौज है।कभी लगता है कि सब व्यर्थ है...और कभी सबकुछ अपना बनाने की होड़ में भागने लगता है।इस मन को समझने की कोशिश सदीयों से जारी है..ऋषि मुनी,ज्ञानी...हर कोई अपने अनुभव के अनुसार जनमानस के कल्याण हेतु अलग-अलग तरीकों से लोगों को इस विष्य पर समझाते रहे हैं।लेकिन,हर जीव के मन की अवस्था अलग है..और उसी अवस्था के परिणाम भी अलग हैं।जहाँ तक मेरी समझ काम करती है..मैं मानता हूँ कि मन अगर किसी सही काम में लग जाये तो इससे बेहतर कोई साथी नहीं है।अगर हमारा जीवन अव्यवस्थित तरीके से जीया जा रहा है तो परिणाम भी सार्थक नहीं होंगें।सबसे पहले हमें अपने जीवन को जीने के ढ़ंग को बदलना चाहिए...शुरुआत में अपने जीवन लक्षय को निर्धारित करना,फिर तय लक्षय की पूर्णता हेतु अपने प्रयासों को..कोशिश रुपी धागे में पिरोना और फिर अपना तन-मन पूरी तरह उसी कार्य को करने मे झोंक देना..ताकि हमें जीने का मक्सद मिल सके।फिर अपने आप घटने वाली घटनाओं से आपका अपना मन सही दिशा में सक्रिय हो जायेगा और रम जायेगा।आहिस्ता-2 सब सवालों से रुबरु आपका मन खुद जवाब ढूंढने में सक्षम हो जायेगा व व्यर्थ छूटता चला जायेगा।

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Life mantras