कुछ तुझसे गिला कातब-ऐ-तकदीर नहीँ है
मिटती न हो ऐसी,कोई तहरीर नहीँ है,
इनाम है मेहनत का,या यह हासिल-ए-गम है
सुख चैन किसी एक की जागीर नहीँ है,
कुदरत का भी कुछ हाथ है बंदे की ख्ता मेँ
यह सब की सब इन्सान की तकसीर नहीँ है,
दिल मायल-ऐ-परवाज नहीँ मुरग-ऐ-कफस का
क्या गम है,अगर आह मेँ तासीर नहीँ है,
हालात की तस्वीर कहो शाद का शेय्र
चूके जो निशाने से,ये वो तीर नहीँ है;
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