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Sunday, August 31, 2014

दिल ढूँढता है फिर वही...

मैं अपने पेशे की बदौलत अक्सर लोगों को बहुत नज़दीक से जानने और समझने की कोशिश करता हूँ.सफ़र के दौरान बहुत से विष्यों पर चर्चा होती रहती है,कुछ लोग समाज में हो रहे बदलाव से चिंतित रहते हैं तो कुछ राजनीतिक उठा पटक पर चिंतन करते हैं.
परन्तु ज्यादातर लोग जो मध्यम वर्गीय परिवारों से होते हैं वो लोग अक्सर अपने ही परिवार की उलझनों में फंसे नज़र आते हैं,कोई महंगाई से त्रस्त है तो कोई पारिवारिक सदस्यों की आधुनिकता से दो चार हो रहा है.बहुत से बुजुर्गों को अपने बच्चों के रहन सहन की चिंता सताये हुए है जैसे बहु बेटीयों का संस्कारी न होना और बेटों के कारोबार का कम होना.
   हर तरफ चिंता ही चिंता और आक्रोश इन्सानी जिंदगी को घुन की तरह लगा हुआ है.बहुत ही विरले लोग अपनी जिंदगी से खुश व सतुंष्ट नज़र आते हैं.
  जितना मैं समझ पाया वो ये कि हम लोगों में से बहुत से ऐसे लोग जो न चाहते हुए भी अनजाने में इस भागती दौड़ती दुनिया के साथ भाग रहे हैं,उन्हे भगवान ने संतुष्टी लायक जीवन दिया भी है पर उसे वो लोग समझ नहीं पा रहे.वो व्यर्थ ही चिंता की चादर कस के ओढे़ हुए हैं,ऐसे लोग किसी के समझाने पर खुद को सही सिद्ध करने के लिए हमेशा अपने पास तर्कों का कवच तैयार रखें रहते हैं.

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