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Sunday, August 3, 2014

कहानी छोटी तड़प गहरी

बहुत याद आये वो गुज़रा जमाना
आपकी एक झलक पाने को
मेरा तड़प जाना...
कभी दरवाजे पे निगाह तो कभी
धूप में छत पे ही सूख जाना,
तुम्हारे घर की वो
पीछे की सीढियों पे निगाह तो
हर वक्त रहती थी....
तेरे दीदार को कई बार,तरस जाना...
मिलने का मौका एक आध बार मिला
केवल ख़तों से ही काम चलाना...
सच कहूं मैं बिल्कुल अनाडी़ था
कभी हाथ न पकडा,न गले लगाया
लेकिन सच ये भी है कि आपके सिवा
कोई और न था इस दिल में बस पाया...
कितना प्यारे थे तुम मुझे
ये कैसे बतलाऊं,खोल के दिल
कैसे दिखलाऊं,
तुम संग जिंदगी बिताने की चाह थी
तुम बिन जिंदगी को जीना कैसे सिखाऊं...
वक्त की तहों मे लिपट के बेशक्क
मेरा प्यार थोडा दब सा गया था,
लेकिन रूह पर लिखे तेरे नाम को
मैं तो चाह कर भी न मिटा पाऊं...
एक एक पल अपनी बर्बादी का
नहीं भूला,मुझे आज भी याद है,
दर्द जुदाई का बाद मुद्दत के
आज भी बरकरार है ....
अपनी आंखों के सामने अपना प्यार
किसी और का होता,देखता रहा
आखरी मुलाकात तुम छत पे आयी
कुछ बात भी हुई शायद...
फिर तो बस तारों को देखता रहा...
शायद तुम्हे मेरी तड़प का अहसास
इतना न हो,पर खुदा जानता है,
अपनी जिंदगी को खोकर न रोये
ये मेरा दिल है दिलबर...
कहाँ मानता है.................!

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