ये तस्वीरें मेरे नाना-नानी जी की हैं।जो अब इस दुनियाँ में नहीँ हैं,लेकिन हमारे ज़हन में उन्की यादें हमेशा जीवित रहेंगीं।
इन दोनों की जिंदगी बहुत मुशकिलों भरी थी,मगर दोनों जब तक जीये,बडी जिंदादिली से जीये।जिंदगी अपनी ही धुन में बितायी।5 बेटीयाँ ही थीं उनके यहाँ,एक बेटा जो बहुत छोटी उम्र में ही गुज़र गया था।सब बेटीयों का पालन पोष्ण और बेटे को खोने का गम,फिर भी जीने का होंसला,मैं कभी-कभी सोचता हूँ कि इतना साहस जुटा पाना,हर किसी के बस की बात नहीं होती।
खैर,मैँ काफी छोटा था जब नाना जी एक ऍक्सीडैंट में हमें छोड गये और कई वर्षो तक साहस जुटाये जीने के बाद आखिर नानी भी इस दुनियाँ से चली गयीं।
उनके साथ बहुत कम वक्त गुजारा है,तो धुंधली सी यादें हैँ दिमाग में,लेकिन उन्हे याद रखने के लिए काफी है।मैनें उनकी ये तस्वीरें बनायी हैं,जो यादों को ताज़ा रखने का माध्यम भी हैं और उनके प्रति हमारा स्नेह भी।
हमारे बुजुर्ग असल में जिंदगी का पूरी किताब की तरह होते है,जिस में से सीख लेकर हम अपनी कमीयों को सुधार सकते है,लेकिन ये अवसर हर किसी को नहीं मिलता।
अपने बुजुर्गों का सम्मान करें और उनके स्नेह के हकदार बनें।
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Sent from my Nokia phone
Sunday, September 29, 2013
Thursday, September 5, 2013
ਤਰੱਕੀ ਦੀ ਰਾਹ
ਇੱਕ ਪਾਸੇ ਤਾਂ ਅਸੀਂ ਸੁਣਦੇ ਹਾਂ ਕਿ ਸਾਡਾ ਭਾਰਤ ਦੇਸ਼ ਤਰੱਕੀ ਦੀ ਰਾਹ ਤੇ ਅਗਾਂਹ ਵਧ ਰਿਹਾ ਹੈ,ਸਾਡੀਆਂ ਸਰਕਾਰਾਂ ਬਹੁਤ ਉਪਰਾਲੇ ਕਰ ਰਹੀਆਂ ਨੇ ਕਿ ਭਾਰਤ ਮੋਹਰੀ ਦੇਸ਼ਾ ਦੀ ਕਤਾਰ ਵਿੱਚ ਜਾ ਖੜੋਵੇ।ਸਾਡੀ ਜਨਤਾ ਦੁਨੀਆਂ ਦੀ ਕਿਸੇ ਵੀ ਸ਼ੈ ਨੂੰ ਵਰਤਨ ਜਾਂ ਵੇਖਣ ਤੋਂ ਕਿਤੇ ਵਾਂਝੀ ਨਾਂ ਰਹਿ ਜਾਵੇ,ਚਾਹੇ ਪੜਾਈ ਦੇ ਖੇਤਰ ਵਿੱਚ,ਚਾਹੇ ਵਿਦੇਸ਼ੀ ਖਾਣਪੀਣ ਜਾਂ ਪਹਿਨਣ ਪੱਖੋਂ।ਪਰ ਕੀ ਕੋਈ ਰਾਸ਼ਟਰ ਬਿਨਾਂ ਆਪਣੀਆਂ ਜੜਾਂ ਮਜਬੂਤ ਕਿਤਿਆਂ ਕਿਵੇਂ ਉਹਨਾਂ ਸ਼ਿਖਰਾਂ ਨੂੰ ਛੂਹ ਸਕਦਾ ਏ,ਜਿਹਨਾਂ ਦੀ ਬੁਨਿਆਦ ਹੀ ਕਮਜ਼ੋਰ ਤੇ ਦਬੇ ਕੁਚਲੇ ਤੇ ਓਹਨਾਂ ਗਰੀਬ ਲੋਕਾਂ ਦੀਆਂ ਟੁੱਟੀਆਂ ਉਮੀਦਾਂ ਦੀ ਲਾਸ਼ਾਂ ਤੇ ਰੱਖੀ ਗਈ ਹੋਵੇ।ਸੁਵਿਧਾਵਾਂ ਦੇ ਨਾਂ ਤੇ ਆਮ ਅਾਦਮੀ ਨਾਲ ਕੋਝਾ ਮਖੌਲ ਕੀਤਾ ਜਾਂਦਾ ਏ,ਨਾਂ ਤਾਂ ਇਸ ਦੇਸ਼ ਵਿੱਚ ਗਰੀਬਾਂ ਨੂੰ ਚੱਜ ਦੀ ਪੜਾੲੀ,ਨਾਂ ਰੋਟੀ ਕਮਾ ਕੇ ਖਾਣ ਦੀ ਵਿਵਸਥਾ ਤੇ ਨਾਂ ਹੀ ਸਿਹਤ ਸੇਵਾਵਾਂ ਨੇ । ਵੇਖਣ ਨੂੰ ਹੈ ਪਰ ਵਰਤਣ ਲਈ ਕੁਝ ਨਹੀਂ। ੲਿਹ ਸਭ ਜਾਣਦੇ ਨੇ ਕਿ ਸਰਕਾਰਾਂ ਦੇ ਦਿੱਤੇ ਹੱਕ ਜਨਤਾਂ ਕਿੰਨੇ ਕੁ ਵਰਤ ਸਕਦੀ ਹੈ । ਖਾਣਪੀਣ,ਪੜਾੲੀ,ਬਜੁਰਗਾਂ ਲੲੀ ਪੈਨਸ਼ਨਾਂ ਤੇ ਮੈਡੀਕਲ ਸਹੂਲਤਾਂ ਦੀ ਜਿਹੜੀ ਕਾਣੀ ਵੰਡ ਹੁੰਦੀ ਹੈ,ਉਸ ਤੋਂ ਵੀ ਸਭ ਜਾਣੂ ਹਨ ਬਹੁਤ ਵਿਉਂਤਾ ਬਣਨ ਤੋਂ ਬਾਅਦ ਜੋ ਕੁਝ ਜਨਤਾ ਲੲੀ ਭੇਜਿਆ ਜਾਂਦਾ ਹੈ ਉਸ ਵਿੱਚੋਂ ਦਸ ਜਾਂ ਵੀਹ ਪ੍ਰਤੀਸ਼ਤ ਹੀ ਲੋਕਾਂ ਤੱਕ ਪਹੁੰਚਦਾ ਹੈ। ਬਾਕੀ ਤਾਂ ਸਰਕਾਰੀ ਕੁਰਸੀਆਂ ਦੀ ਭੇਟ ਚੜ੍ਹ ਜਾਂਦੈ । ਉਸ ਬਚੇ ਕੁਚੇ ਨੂੰ ਲੈਣ ਲੲੀ ਜਿੱਥੋਂ ਦੇ ਲੋਕ ਅਾਪਸ ਵਿੱਚ ਲੜ ਮਰਦੇ ਹੋਣ ਤਾਂ ਕੋੲੀ ਕਿਵੇਂ ਕਹਿ ਸਕਦਾ ਹੈ ਕਿ ਅਸੀਂ ਕੋੲੀ ਵਿਕਾਸ ਕੀਤਾ ਤੇ ਅਸੀਂ ਅੱਗੇ ਵਧ ਰਹੇ ਹਾਂ।
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Tuesday, September 3, 2013
डोल रहा विश्वास
आज जो हालात भारत मेँ कन्या भ्रूण और नाबालिग लडकीयों के यौन शोषण को
लेकर बने हुए हैं वो गहन चिंता का विष्य होने के साथ साथ भारत की महान
संस्कृति की साख पर बदनुमा दाग़ हैं।
और उसपे त्रासदी ये भी है कि जिस भारत वर्ष को आध्यात्मिक देश का दर्ज़ा
हासिल है उस भूमि पर जो ये घिनौने कृत्य अंजाम दिये जा रहे हैं उन्मे आम
आदमी से ज्यादा साधु-संतों का शुमार होना निहायत ही शर्म की बात है।साधु
संत याँ आध्यात्मिक गुरुओँ का नाम ऐसे प्रकरणोँ में आना समाज में खत्म हो
रही नैतिकता का वो रुप हैं जिसके आगे हम और इन्सानों से किसी प्रकार की
नैतिकता की आस लगायें तो बेमानी होगी।क्योंकि हमारे पूर्वजों के समय से
जो संस्कारों की शिक्षा का हवाला इस देश के बच्चों को दिया जाता रहा है
उन संसकारों के मंदिर में साधु महात्माओं का स्थान शीर्ष पर है और भगवान
स्वरूप उन्हे मान्यता प्रदान की गयी है:
तीन लोक नौ खंड में,गुरु से बडा न कोये,
कर्ता करे न कर,सके गुरु करे सो होये;
पिछ्ले कुछ समय से ऐसी वारदातें लोगों के विश्वास को तार तार कर रहीं हैं।
मेरी व्यक्तिगत राय है कि इन सबके पीछे मौजूद पुख्ता कारण जो है वो ये कि
साधु-संत,और गुरुजनों की जीवनशैली अब वैसी न होना जैसी का पुरानें समयोँ
में वर्णन मिलता है।
देखिये,सुख सुविधायें तो उन पुरानें वक्तों में भी बहुत थीं,जब उन्हें
त्याग लोग सन्यासी बनते थे।परमात्मा की खोज में सब सुविधायें छोडछाड वो
आश्रमों में कठिन परिस्थितियों को अपनाकर अपना जीवन व्यतीत करते थे,और
मुक्ति की खोज और समस्त जीवों के कल्याण हेतू अपना जीवन अर्पण कर देते
थे।
क्या आज कोई भी संत आपको उस कोटि का दिखाई पडता है?मेरी जिंदगी में तो
वैसा न मैनें किसी से सुना और न खुद देखा है।आजकल के ज्यादातर गुरु बातें
तो बहुत उँचीं करते हैं,लेकिन उनको न तो वो अपने भक्तों के जीवन में उतार
पाते हैं और न हीं खुद उन बातों पर खरे उतरते हैं।
भक्तों की बेशुमार भीड,करोडों रुपयों की लागत से तैयार आश्रम,खुद का
अत्याधुनिक सुविधायें जैसे महंगी कारें,मोबाइल,एसी कुटियायें और देश
विदेश की यात्रायों से लैस होना,एक प्रकार का 'भोग' ही तो
हैं।भोग-विलास,अंहकार और लालच जैसी जिन बुरी आदतों को छोड साधु का चोला
पहना जाता है,उन्ही को वो दोबारा से ग्रहण कर,किस तरह का भला जनता का कर
सकते है?इन बातों से मैं,आप सभी भलीभांति परिचित्त हैं।
लेकर बने हुए हैं वो गहन चिंता का विष्य होने के साथ साथ भारत की महान
संस्कृति की साख पर बदनुमा दाग़ हैं।
और उसपे त्रासदी ये भी है कि जिस भारत वर्ष को आध्यात्मिक देश का दर्ज़ा
हासिल है उस भूमि पर जो ये घिनौने कृत्य अंजाम दिये जा रहे हैं उन्मे आम
आदमी से ज्यादा साधु-संतों का शुमार होना निहायत ही शर्म की बात है।साधु
संत याँ आध्यात्मिक गुरुओँ का नाम ऐसे प्रकरणोँ में आना समाज में खत्म हो
रही नैतिकता का वो रुप हैं जिसके आगे हम और इन्सानों से किसी प्रकार की
नैतिकता की आस लगायें तो बेमानी होगी।क्योंकि हमारे पूर्वजों के समय से
जो संस्कारों की शिक्षा का हवाला इस देश के बच्चों को दिया जाता रहा है
उन संसकारों के मंदिर में साधु महात्माओं का स्थान शीर्ष पर है और भगवान
स्वरूप उन्हे मान्यता प्रदान की गयी है:
तीन लोक नौ खंड में,गुरु से बडा न कोये,
कर्ता करे न कर,सके गुरु करे सो होये;
पिछ्ले कुछ समय से ऐसी वारदातें लोगों के विश्वास को तार तार कर रहीं हैं।
मेरी व्यक्तिगत राय है कि इन सबके पीछे मौजूद पुख्ता कारण जो है वो ये कि
साधु-संत,और गुरुजनों की जीवनशैली अब वैसी न होना जैसी का पुरानें समयोँ
में वर्णन मिलता है।
देखिये,सुख सुविधायें तो उन पुरानें वक्तों में भी बहुत थीं,जब उन्हें
त्याग लोग सन्यासी बनते थे।परमात्मा की खोज में सब सुविधायें छोडछाड वो
आश्रमों में कठिन परिस्थितियों को अपनाकर अपना जीवन व्यतीत करते थे,और
मुक्ति की खोज और समस्त जीवों के कल्याण हेतू अपना जीवन अर्पण कर देते
थे।
क्या आज कोई भी संत आपको उस कोटि का दिखाई पडता है?मेरी जिंदगी में तो
वैसा न मैनें किसी से सुना और न खुद देखा है।आजकल के ज्यादातर गुरु बातें
तो बहुत उँचीं करते हैं,लेकिन उनको न तो वो अपने भक्तों के जीवन में उतार
पाते हैं और न हीं खुद उन बातों पर खरे उतरते हैं।
भक्तों की बेशुमार भीड,करोडों रुपयों की लागत से तैयार आश्रम,खुद का
अत्याधुनिक सुविधायें जैसे महंगी कारें,मोबाइल,एसी कुटियायें और देश
विदेश की यात्रायों से लैस होना,एक प्रकार का 'भोग' ही तो
हैं।भोग-विलास,अंहकार और लालच जैसी जिन बुरी आदतों को छोड साधु का चोला
पहना जाता है,उन्ही को वो दोबारा से ग्रहण कर,किस तरह का भला जनता का कर
सकते है?इन बातों से मैं,आप सभी भलीभांति परिचित्त हैं।
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