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Tuesday, December 9, 2014

ये नगमा किसी अनजान शायर का है ।

नामाबर अपना हवाओँ को बनाने वाले
अब न आयेँगेँ कभी पलट कर जाने वाले,
क्या मिलेगा तुझे बिखरे हुए ख्वाबोँ के सिवा
रेत पर चाँद की तस्वीर बनाने वाले,
मयकदेँ बंद हुऐ ढूँढ रहा हुँ तुमको
तु कहाँ है,मुझे आँखोँ से पिलाने वाले,
काश ले जाये कभी माँग कर आँखे मेरी
ऍ मुसाव्विर तेरी तस्वीर बनाने वाले,
तूँ इस अंदाज मेँ कुछ और हंसी लगता है
मुझ से मुँह फेरके गज़ले मेरी गाने वाले;

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