बगदाद के खलीफा हारुन अल राशिद को दान देने का भूत सवार रहता था।वह प्रतिदिन घोडे पर सवार होकर शहर से गुजरता था और जो भी सामने पड जाता उसकी और चाँदी के सौ टुकडोँ से भरी थैली उछाल देता था।इस तरह 12वर्षोँ तक यही क्रम चलता रहने से वह कंगाल हो गया।
मिस्र के टकसाल के मालिक खलील घाहेटी ने अपने जीवन काल मेँ कई बार मक्का की यात्रा की।वह 800मील लम्बी यात्राओँ के दौरान मार्ग मेँ सोने की मोहरेँ बिछवाता था,ताकि उसका ऊँट प्रत्येक कदम सोने पर रखे।कारवां गुजर जाने के बाद राही उन सिक्कोँ को उठा लेते थे।उसका कोष इसी तरह समाप्त हो गया।
हैदराबाद के छठे निज़ाम मीर महबूब अली को प्रतिदिन नई पोशाक पहनने का शौक था।
मंगोलिया के शेख शाहरुख ने अपने 43 जन्मदिन अनोखे ढंग से मनाये।उसके जन्मदिन पर जो भी उसके दरवाजे पर आता उसे हीरे-मोती-पन्नोँ से भरा थाल दिया जाता था,43 वर्षोँ तक ये परम्परा चलते रहने से उसका कोष समाप्त हो गया।
स्पेन के अधिकृत गायना(अफ्रीका)मे एक सम्राट व्यूविस्त्र को हर रोज मूल्यवान सिंहासन पर बैठने का शौक था और एक बार बैठने के बाद वो उसे नदी मेँ प्रवाहित करवा देता था।
(मंथन)प्रस्तुति:जनकराम साहू
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Wednesday, July 17, 2013
Tuesday, July 16, 2013
कुसूर-ऐ-नज़र
कुछ तो तेरी नज़र का
कुसूर था जरुर,ऍ साकी,
डोल गये जो कदम,वर्ना
महफिलेँ तो रोज़ की बात हैँ...;
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कुसूर था जरुर,ऍ साकी,
डोल गये जो कदम,वर्ना
महफिलेँ तो रोज़ की बात हैँ...;
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Tuesday, July 2, 2013
'अविष्कार पेनिसिलिन का'
कई बार अचानक घटित हुई घटना,और उससे उजागर रहस्य,जिसके लिए कोई विशेष प्रयास न किया गया हो,मनुष्य जाति के लिए वरदान साबित हो जाता हैँ।
ऐसी ही एक घटना 28सतंबर1928 को लंदन के सेँट मेरी हास्पिटल मेँ घटी।अपनी लापरवाही से मजबूर एलैक्जेँडर ने जब कई दिनोँ की छुट्टी के बाद आकर लैब मेँ देखा कि जिस तश्तरी(Petrydish)मेँ फोडोँ की मवाद का नमूना खुला रख के भूल गये थे,उसमेँ फफूँद उग आई थी।उस तश्तरी को साफ करने से पहले जब माइक्रोस्कोप की मदद से देखा तो हैरान करने वाला तथ्य सामने आया कि जहाँ जहाँ फफूँद पनपी थी वहाँ बैक्टीरिया मर चुके थे।
तरीके से प्रयोग करने पर पाया कि फफूँद पेनिसिलियम नोटाडम थी,जिसमेँ संक्रामक रोग फैलाने वाले बैक्टीरिया को नष्ट करने की क्षमता थी।तो,उन्ही फफूँदो से जो दवा बनी,उसे हम 'पेनिसिलिन'कहते हैं।
इस दवा के खोजकर्ता 'सर एलैक्जेँडर फ्लेमिंग'(जीववैज्ञानिक और औषधिनिर्माता)थे,जिनहे उनकी इस खोज के लिए सन1945 मेँ संयुक्त रुप से नोबेल पुरस्कार दिया गया।6अग्सत1881 को जनमेँ इस महान वैज्ञानिक का 74 वर्ष की उम्र मेँ लंदन स्थित उन्के घर मेँ हार्ट अटैक की वचह से 11मार्च1955 को निधन हो गया।
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ऐसी ही एक घटना 28सतंबर1928 को लंदन के सेँट मेरी हास्पिटल मेँ घटी।अपनी लापरवाही से मजबूर एलैक्जेँडर ने जब कई दिनोँ की छुट्टी के बाद आकर लैब मेँ देखा कि जिस तश्तरी(Petrydish)मेँ फोडोँ की मवाद का नमूना खुला रख के भूल गये थे,उसमेँ फफूँद उग आई थी।उस तश्तरी को साफ करने से पहले जब माइक्रोस्कोप की मदद से देखा तो हैरान करने वाला तथ्य सामने आया कि जहाँ जहाँ फफूँद पनपी थी वहाँ बैक्टीरिया मर चुके थे।
तरीके से प्रयोग करने पर पाया कि फफूँद पेनिसिलियम नोटाडम थी,जिसमेँ संक्रामक रोग फैलाने वाले बैक्टीरिया को नष्ट करने की क्षमता थी।तो,उन्ही फफूँदो से जो दवा बनी,उसे हम 'पेनिसिलिन'कहते हैं।
इस दवा के खोजकर्ता 'सर एलैक्जेँडर फ्लेमिंग'(जीववैज्ञानिक और औषधिनिर्माता)थे,जिनहे उनकी इस खोज के लिए सन1945 मेँ संयुक्त रुप से नोबेल पुरस्कार दिया गया।6अग्सत1881 को जनमेँ इस महान वैज्ञानिक का 74 वर्ष की उम्र मेँ लंदन स्थित उन्के घर मेँ हार्ट अटैक की वचह से 11मार्च1955 को निधन हो गया।
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