Wednesday, March 11, 2026
Thursday, January 1, 2026
The divine power that exists within
At the edge of human reasoning, where logic falters, the divine name begins its work.
It doesn’t demand brilliance—only sincerity.
A single, honest cry from the heart is enough to awaken its boundless grace.
Wednesday, July 27, 2022
ਸੱਚਾ ਇਸ਼ਕ ਖ਼ੁਦਾ ਦਾ
ਸੱਚਾ ਇਸ਼ਕ ਓਸ ਖ਼ੁਦਾ ਦਾ
ਜੋ ਮਿਲ ਕੇ ਜੁਦਾ ਨਾ ਹੋਵੇ
ਝੂਠੇ ਹਨ ਸਭ ਰਿਸ਼ਤੇ ਐੱਥੇ
ਜੋ ਵੀ ਲਾਉਣ ਪ੍ਰੀਤਾਂ,ਸੋ ਰੋਵੇ
ਖ਼ੁਦਾ ਮਹਿਬੂਬ ਬਣ ਜਾਂਦੈ
ਕਦੀ ਮਹਿਬੂਬ ਖ਼ੁਦਾ ਨਾ ਹੋਵੇ
Saturday, July 16, 2022
ਛੱਡ ਖਹਿੜਾ
ਉਡੀਕ...ਮੁੱਕਦੀ ਨਹੀਂ !
ਮੁਕਾਉਣੀ ਪੈਂਦੀ ਹੈ ;
ਮਨ ਨੂੰ ਸਮਝਾ ਕੇ...
ਜ਼ਿੰਦਗੀ ਦੇ ਹੋਰ,ਰੰਗ ਦਿਖਾ ਕੇ
ਕੇ ਚਲ ਮਨਾਂ,ਛੱਡ ਖਹਿੜਾ
ਓਥੇ ਕੀ ਮਿਲਣਾ,ਜਿੱਥੇ ਰਹੇ ਚੁੱਪ
ਮੰਗ ਨਾ ਖੈਰਾਤ..!
ਜਿੱਥੇ ਸੁੰਨੇ ਹੋਣ ਜਜ਼ਬਾਤ
ਅੱਗੇ ਤੁਰ, ਛੱਡ ਖਹਿੜਾ
Monday, June 20, 2022
ਦਿਲਾਸੇ
ਕੁਝ ਪੁਰਾਣੀਆਂ ਗੱਲਾਂ ਚੈਟ ਦੀਆਂ
ਪੜ੍ਹ ਕੇ ਹੀ ਮਨ ਪਰਚਾ ਲਈਦੈ,
ਕੋਈ ਆਪਣਾ ਬਣਾ ਕੇ ਭੁੱਲ ਗਿਆ
ਹੌਂਸਲਾ ਦੇ ਕੇ ਮਨ,ਸਮਝਾ ਲਈਦੈ,
ਵਕਤ ਬਦਲ ਗਿਆ, ਸ਼ਾਇਦ
ਉਹ ਨਹੀਂ ਬਦਲਿਆ ਹੋਣਾ...
ਉਮੀਦ ਝੂਠੀ ਦਾ ਦੇ ਦਿਲਾਸਾ
ਭਰੋਸਾ ਪਿਆਰ ਦਾ ਬਚਾ ਲਈਦੈ,
ਨਹੀਂ ਹਰਖ਼ ਕਿ ਉਹ ਦੂਰ ਰਹਿਕੇ
ਰਾਜ਼ੀ ਹੈ, ਓਸਤੇ ਮੇਰਾ ਹੱਕ ਵੀ ਕੀ ?
ਚੁੱਪ ਰਹਿਕੇ, ਉਡੀਕਾਂ ਦਾ ਸਿਤਮ
ਤਨ ਆਪਣੇ ਉੱਤੇ ਹੰਢਾ ਲਈਦੈ...
ਤਨ ਆਪਣੇ ਉੱਤੇ.....!!!!!
Monday, February 28, 2022
Girl with horse
I think every day effort definitely leads to improvement.Just thinking makes the wings flutter but flight is not possible.
Girl with horse
Size: 24 inches ×36 inches
Medium: Oil colour
Wednesday, April 28, 2021
ਕੁਝ ਘਟ ਜਾ ਗਿਐ
ਬਾਕੀ ਤਾਂ ਸਭ ਠੀਕ ਐ,ਪਤਾ ਨਹੀਂ ਕਿਉਂ
ਲਗਦੈ ਜਿੰਦਗੀ ਚੋਂ ਕੁਝ ਜਿਵੇਂ ਘਟ ਜਾ ਗਿਐ,
ਮੁੜ ਚਿਹਰੇ ਤੋਂ ਪਹਿਲਾਂ ਵਾਂਗ ਹਾਸਾ ਮੇਰੇ, ਤੇ
ਖ਼ਵਾਬਾਂ ਨੂੰ ਪਿਆ ਬੂਰ,ਕਿਉਂ ਘਟ ਜਾ ਗਿਐ ?
ਜੇ ਹੈ ਕੋਈ ਜਵਾਬ ! ਤਾਂ ਹੋ ਸਕੇ ਜਰੂਰ ਦੇਣਾ
ਸਾਹਾਂ ਦਾ ਖੈਰ-ਸਿਲਸਿਲਾ ਵੀ ਗੁੰਮ ਜਿਹਾ ਲਗਦੈ,
ਰਾਹਾਂ ਦੀ ਵਾਟ੍ਹ ਜੋਹਣਾ ਅੱਜਕਲ੍ਹ ਘਟ ਜਾ ਗਿਐ;
ਰੀਝਾਂ ਦਿਲ ਦੀਆਂ ਦਾ ਵਜ਼ਨ ਤਾਂ ਓਨਾ ਈ ਐ,ਪਰ
ਉਮੀਦਾਂ ਦਾ ਪਤਾ ਨਹੀਂ ਕਿਉਂ ਘਟ ਜਾ ਗਿਐ।
ਲਿਖਣ ਦਾ ਚੱਜ ਤਾਂ ਪਹਿਲਾਂ ਈ ਨੀਂ ਦਿੱਸ਼ੇ ਨੂੰ
ਪਤੈ ! ਪਰ ਕਾਗਜ਼ਾਂ ਨਾਲ ਵੀ ਰਾਬਤਾ ਸੱਚੀਂ !
ਘਟ ਜਾ ਗਿਐ ! ਦੱਸੀਂ...ਕਿਉਂ ਘਟ ਜਾ ਗਿਐ ?
Wednesday, April 14, 2021
Thursday, April 8, 2021
ਤੋਲ ਦਿਆਂ ਵਿੱਚ ਬਦਲੇ
ਤੇਰਾ ਮੈਨੂੰ ਯਾਦ ਕਰਨਾ
ਕੀ ਦੱਸਾਂ ਮੈਨੂੰ ਕੀ ਮੁੱਲ ਲੱਗੇ,
ਲੱਗੇ,ਤੋਲ ਦਿਆਂ ਵਿੱਚ ਬਦਲੇ
ਬਸ ਓਹਨਾ ਦੋ ਘੜੀਆਂ ਦੇ
ਜਿੰਦ ਆਪਣੀ ਤੇਰੇ ਹਿੱਸੇ,
ਜਿਹਨਾਂ ਘੜੀਆਂ 'ਚ ਚੇਤਾ
ਮੇਰਾ ਤੂੰ ਕਰਦੀ ਏਂ...!
Monday, March 22, 2021
ਡਰ
ਐਨਾਂ....
ਕਿਉਂ ਡਰ ਲਗਦੈ ?
ਕਿ ਕਿਤੇ ਰੁੱਸ ਨਾ ਜਾਵੇ !
ਮਸਾਂ ਮਸਾਂ ਤਾਂ ਬਹੁੜਿਆ ਏ
ਮੁੜ ਸੱਜਣ ਦਿਲ ਦੇ ਵਿਹੜੇ,
ਚਾਵਾਂ ਭਰਿਆ ਭਾਂਡਾ
ਹੱਥੋਂ ਮੇਰੇ ਰੁੜ ਨਾ ਜਾਵੇ;
ਰੱਖਾਂ ਬੋਚ ਬੋਚ ਪੈਰ
ਨਾਲ ਓਹਦੇ ਚੱਲਣੇ ਨੂੰ,
ਕਾਹਲ ਕਰੀਂ ਤੋਂ ਹਰਖਿਆ
ਪਿੱਛੇ ਮੁੜ ਨਾ ਜਾਵੇ;
ਇਸ਼ਕ਼ ਕਮਾਉਣਾ ਨਹੀਂ ਸੌਖਾ
“ਦਿੱਸ਼ਾ"ਡਰੇ ਏਸੇ ਲਈ !
ਵਫ਼ਾ ਉਹਦੀ ਬਦਲੇ
ਵਜ਼ਨ ਮੇਰੇ ਇਸ਼ਕ ਦਾ
ਕਿਤੇ ਥੁੜ ਨਾ ਜਾਵੇ।
Tuesday, February 16, 2021
ਸੱਜਣ
ਖ਼ਿਆਲ ਸੱਜਣਾਂ ਦਾ,ਸੱਜਰੀ ਸਵੇਰ ਵਰਗਾ
ਜਿਵੇਂ ਕੱਲਰਾਂ 'ਚ ਮਸਾਂ,ਖਿੜੇ ਕਿਸੇ ਫੁੱਲ ਵਰਗਾ
ਸੱਧਰਾਂ ਦੇ ਬਜ਼ਾਰ,ਕਿਸੇ ਲੁਟੇ ਖੜ੍ਹੇ ਨੂੰ ਮਿਲ ਜੇ
ਬਦਲੇ ਗ਼ਮਾਂ ਦੇ ਸਾਥੀ,ਹੀਰਿਆਂ ਦੇ ਮੁੱਲ ਵਰਗਾ
Monday, January 20, 2020
हुनर फ़रमानी नाज़ का
वाह...भगवान ने क्या हुनर दिया है इस फ़रमानी नाज़ को,आवाज़ व अदायगी...दोनों बा कमाल।ये कड़वी सच्चाई है कि गरीबी इन्सान की प्रतिभा को दबा कर रखती है। लेकिन कुछ लोग इनके जैसे,जब कोशिश करना नहीं छोडते और अपने हुनर को प्रदर्शित करने का प्रयास निरंतर करते रहते हैं। तब गरीबी की वही जंजीरें, वो सीढ़ियाँ भी बन सकती हैं,जो हमें बेहतर जीवन जीने की उस उंचाई पर पहुंचा देती हैं जिसकी हर मनुष्य को कामना रहती है।
हम सभी को भगवान ने कुछ न कुछ ऐसे गुण जरूर दिये हैं जो गुण दुनिया में हमारी अपनी एक अलग पहचान बनाने में मदद करते हैं,बस जरूरत है कि हम अपने उन गुणों को कड़ी मेहनत से और अधिक निखारें व प्रदर्शित करें,तो फिर कोई वजह नहीं कि हम उम्र भर जीवन को भलीभांति व उल्लास से न जी पाएं।जो जीवन हमें निःसंदेह आनंद से जीने के लिए ही प्राप्त हुआ है ।
कलाकार- फ़रमानी नाज़
गाँव मुहम्मद पुर, मुजफ्फरनगर
जगदीश कुमार दिश्शा
Saturday, March 16, 2019
My New Watercolor Painting
This #watercolor #painting is ready today. As before, it was realized that it is only a picture of 21 × 29 centimeters in size and if it was made on large size papers, then I could have painted this image more accurately; Because this image is portrayed as #realistic, the subject is large and the details are too much, the place is probably even more needed.
Although I will definitely paint this image in bigger size, but before next I thought it should be shared with friends,so that views of people can be taken.
(Note: This picture is captured by a photographer named #"Sasin Tipchai", from which it was copied.)
Sunday, February 3, 2019
Quila Mubarak
#Qila Mubarak
“किला मुबारक” हमारे शहर पटियाला में एक प्रसिद्ध किला है। इसकी नींव 12 फरवरी 1763 को शहर के संस्थापक #बाबा आला सिंह ने रखी थी।
“किला मुबारक” हमारे शहर पटियाला में एक प्रसिद्ध किला है। इसकी नींव 12 फरवरी 1763 को शहर के संस्थापक #बाबा आला सिंह ने रखी थी।
मैंने पहली बार ऐसा कोई सिटीस्केप पेंट करने की कोशिश की है। इस पेंटिंग को बनाने के दौरान, मुझे एहसास हुआ कि यह काम केवल देखने में आसान है, बनाना बहुत मुश्किल है। क्योंकि मैं इसे जैसा बनाने के बारे में सोच रहा था, शायद मैं उसका आधा भी बनाने में सफल नहीं हुआ क्योंकि इस माध्यम व इस शैली में पेंटिंग्स बनाने के लिए नियमित अभ्यास की आवश्यकता है।खैर इस तरह के और प्रयास आगे भी जारी रहेंगे।
लेकिन फिलहाल मैं तेल रंगों के साथ एक नई पेंटिंग शुरू करने की तैयारी कर रहा हूं।जब बनेगी तब जरुर साझा करूंगा।
लेकिन फिलहाल मैं तेल रंगों के साथ एक नई पेंटिंग शुरू करने की तैयारी कर रहा हूं।जब बनेगी तब जरुर साझा करूंगा।
Monday, January 28, 2019
Friday, January 18, 2019
ਆਟੇ ਦੀ ਢੋਲੀ
ਕਿੱਥੋਂ ਲੈ ਜਾਂ ਘੁਮਾਉਣ ਜਿੱਦ ਕਰਦੇ ਜੁਆਕਾਂ ਨੂੰ
ਹਾਲੇ ਭੁੱਖ ਆਲਾ ਪਾੜ ਤਾਂ ਪੂਰਿਆ ਜਾਵੇ ਨਾ,
ਦਿਨੋਂ ਦਿਨ ਮਹਿੰਗਾਈ ਜਿਓਂ ਦਿਓ ਕੱਦ ਵਧੇ
ਪੇੱਡਾ ਕਮਾਈ ਦਾ ਰੱਬਾ ਕਿਉਂ ਬੂਰਿਆ ਜਾਵੇ ਨਾ,
ਢੋਲੀ ਆਟੇ ਦੀ ਭੁੱਖੀ ਭੁੱਬਾਂ ਮਾਰੇ ਰੋਜ਼ ਰੋਜ਼
ਰਿਜਕ ਟੱਬਰ ਦੇ ਮੁੰਹੀਂ ਪੂਰਾ ਸੂਰਾ ਵੀ ਜਾਵੇ ਨਾ,
“ਦਿੱਸ਼ਾ” ਰਾਹਾਂ ਦੀ ਭੱਜ ਭੱਜ ਨਿੱਤ ਵਾਟ੍ਹ ਮੁਕਾਵੇ
ਰਾਹ ਭੈੜਾ ਇਹ ਕਿਸੇ ਮੰਜਲ ਵਲ ਨੂੰ ਜਾਵੇ ਨਾ,
ਰਾਹ ਭੈੜਾ ਇਹ ਕਿਸੇ ਮੰਜਲ ਵਲ ਨੂੰ ਜਾਵੇ ਨਾ।
Jagdish Kumar Dissha
Tuesday, July 3, 2018
Memories
मैं अपने बनाए कुछ स्कैच आपसे शेयर करना चाहता हूँ।वैसे तो इन तस्वीरों मे कोई खास बात नहीं है लेकिन जिन हालात मे व जिस जगह मैंने ये बनाए वो मेरे लिए बहुत परेशानी का समय था।
बात यूं है कि मुझे कुछ दिन किसी कारणवश कारागार मे बिताने पडे तो वहां मेरे लिए समय बिताना सबसे बडी चुनौती थी।न मालूम कि क्या वजह थी कि वहां पैन-पैनसि्ल व सफेद कागज मिलना करीब-करीब नमुमकिन था।औऱ बिना कागज पैंसिल के मेरे लिए कहीं भी रहना मुश्किल है।
खैर कागज तो किसी तरह जुटा लिए जैसे कुछ प्रशासनिक काम करने वाले कैदियों से,कुछ अखबार मे आने वाले पंफलैट्स व कुछ पुरानी दवाई लिखी परचीयों की बैकसाइड वाले कागज।अब दिक्कत थी पैंसिल-रबड की।तो इसके लिए स्कूल (जो अशिक्षित बंदियो के लिए कारागार के ही भीतर चलाया जाता है) मे पढने के लिए जाने लगा।अब हिंदी,पंजाबी भाषा तो मैं भली प्रकार जानता हूं व अंग्रेजी भी,जितनी अपना काम चलाने के लिए जरूरी है...आती है।तो सोचा कि उर्दू सीख लेते हैं,अगर आ गई तो ठीक वर्ना जहां हैं वहां से तो कोई हिला नहीं सकता।
बस एक दो दिन मे ही मुझे पैन-पैंसिल,रबड और स्लेट मिल गई।फिर स्कूल एक-दो दिन जाकर बंद कर दिया जाना।स्कूल छोडने की एक वजह ये भी थी कि उर्दू की किताब (कैदा) एक ही थी और उसे एक और पढने वाला ले गया व लौटाकर न गया,मेरे शिक्षक भी उसी किताब मे से पढ के समझा पाते थे।
दसम गुरु श्री गुरु गोबिंद सिंह जी
तो पहली जो दो तस्वीरें हैं ये वहां सजा काट रहे राजस्थान के राजू भाई के लिए बनाई,जो कैद के दौरान यहां पंजाब जेल मे रहते हुए सिक्ख धर्म से खासे प्रभावित हुए व अ्मृत छक के,हिंदू से सरदार हो गये।उनके लिए बनाई ,हाथ मे फूल लिए लडकी की तस्वीर असल मे देवदर्शन धूप के कवर के उपर छपी लडकी की है,जो राजू भाई को बेहद पसंद थी। जब उन्होंने कहा तो मुझे थोड़ा अजीब लगा लेकिन क्या है जो बात किसी के दिल को अच्छी लग गई तो लग गई।अब ऐसी बात पे किसी बहस का कोई तुक नहीं बनता था,सो मैंने बना दी।
दूसरी तस्वीर गुरु गोबिंद सिंह जी की है,जो एक पंजाबी मैगजीन “आत्म मार्ग” के कवर से कॉपी की थी।
बाकी तस्वीरें अपना समय व्यतीत करने के लिए कभी अखबार से,कभी किसी रसाले से देख कर बनाई।
गुलाम अली खां साहब
कुछ एक-दो पोट्रेट भी बनाए थे जो उन्हें ही दे दिये जिनके बनाए थे।
बात यूं है कि मुझे कुछ दिन किसी कारणवश कारागार मे बिताने पडे तो वहां मेरे लिए समय बिताना सबसे बडी चुनौती थी।न मालूम कि क्या वजह थी कि वहां पैन-पैनसि्ल व सफेद कागज मिलना करीब-करीब नमुमकिन था।औऱ बिना कागज पैंसिल के मेरे लिए कहीं भी रहना मुश्किल है।
खैर कागज तो किसी तरह जुटा लिए जैसे कुछ प्रशासनिक काम करने वाले कैदियों से,कुछ अखबार मे आने वाले पंफलैट्स व कुछ पुरानी दवाई लिखी परचीयों की बैकसाइड वाले कागज।अब दिक्कत थी पैंसिल-रबड की।तो इसके लिए स्कूल (जो अशिक्षित बंदियो के लिए कारागार के ही भीतर चलाया जाता है) मे पढने के लिए जाने लगा।अब हिंदी,पंजाबी भाषा तो मैं भली प्रकार जानता हूं व अंग्रेजी भी,जितनी अपना काम चलाने के लिए जरूरी है...आती है।तो सोचा कि उर्दू सीख लेते हैं,अगर आ गई तो ठीक वर्ना जहां हैं वहां से तो कोई हिला नहीं सकता।
बस एक दो दिन मे ही मुझे पैन-पैंसिल,रबड और स्लेट मिल गई।फिर स्कूल एक-दो दिन जाकर बंद कर दिया जाना।स्कूल छोडने की एक वजह ये भी थी कि उर्दू की किताब (कैदा) एक ही थी और उसे एक और पढने वाला ले गया व लौटाकर न गया,मेरे शिक्षक भी उसी किताब मे से पढ के समझा पाते थे।
तो पहली जो दो तस्वीरें हैं ये वहां सजा काट रहे राजस्थान के राजू भाई के लिए बनाई,जो कैद के दौरान यहां पंजाब जेल मे रहते हुए सिक्ख धर्म से खासे प्रभावित हुए व अ्मृत छक के,हिंदू से सरदार हो गये।उनके लिए बनाई ,हाथ मे फूल लिए लडकी की तस्वीर असल मे देवदर्शन धूप के कवर के उपर छपी लडकी की है,जो राजू भाई को बेहद पसंद थी। जब उन्होंने कहा तो मुझे थोड़ा अजीब लगा लेकिन क्या है जो बात किसी के दिल को अच्छी लग गई तो लग गई।अब ऐसी बात पे किसी बहस का कोई तुक नहीं बनता था,सो मैंने बना दी।
दूसरी तस्वीर गुरु गोबिंद सिंह जी की है,जो एक पंजाबी मैगजीन “आत्म मार्ग” के कवर से कॉपी की थी।
बाकी तस्वीरें अपना समय व्यतीत करने के लिए कभी अखबार से,कभी किसी रसाले से देख कर बनाई।
गुलाम अली खां साहब
कुछ एक-दो पोट्रेट भी बनाए थे जो उन्हें ही दे दिये जिनके बनाए थे।
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