एक्स-रे की खोज 'विल्हेम कानरैड रांटजन'(27मार्च1845-10फरवरी1923) ने सन1895 मेँ की थी।
उन्होने इसके लिए विशेष प्रयास नहीँ किया था।वह एक दिन सामानय ढंग से काँच की नली के दोनोँ छोरोँ को तारोँ से जोड कर विद्युत परिपथ पैदा कर रहे थे।इसी दौरान एक घटना घटी।रांटजन के नली को काले कपडे से लपेटने के बावजूद मेज पर हरे रंग की तरंगे झिलमिला रही थीँ।तब आश्चर्य का ठिकाना न रहा,जब देखा गया कि हरे रंग की ये तरंगेँ अपारदर्शक पदार्थोँ को भेद जाती है।इस घटना का प्रायोगिक अध्ययन करने के बाद रांटजन ने इन्हे 'एक्सरेज़' अर्थात 'अज्ञात किरणेँ' का नाम दिया।किन्तु जर्मनी मेँ उनके सम्मान मेँ इनहेँ 'रांटजन किरणेँ' ही कहा जाता है।
'विल्हेम कानरैड रांटजन'(रांटजन क्रुकस)ने जब ये खोज की तब वो जर्मनी के वुटर्सबर्ग विश्वविद्यालय मेँ भौतिकी के प्राध्यापक थे।इस महान खोज के लिए उन्हे सन1909 मेँ भौतिकी मेँ नोबेल पुरस्कार भी दिया गया।
(कुछ अंश बाल केसरी,20अगस्त2011 से लिए गये हैँ)
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उन्होने इसके लिए विशेष प्रयास नहीँ किया था।वह एक दिन सामानय ढंग से काँच की नली के दोनोँ छोरोँ को तारोँ से जोड कर विद्युत परिपथ पैदा कर रहे थे।इसी दौरान एक घटना घटी।रांटजन के नली को काले कपडे से लपेटने के बावजूद मेज पर हरे रंग की तरंगे झिलमिला रही थीँ।तब आश्चर्य का ठिकाना न रहा,जब देखा गया कि हरे रंग की ये तरंगेँ अपारदर्शक पदार्थोँ को भेद जाती है।इस घटना का प्रायोगिक अध्ययन करने के बाद रांटजन ने इन्हे 'एक्सरेज़' अर्थात 'अज्ञात किरणेँ' का नाम दिया।किन्तु जर्मनी मेँ उनके सम्मान मेँ इनहेँ 'रांटजन किरणेँ' ही कहा जाता है।
'विल्हेम कानरैड रांटजन'(रांटजन क्रुकस)ने जब ये खोज की तब वो जर्मनी के वुटर्सबर्ग विश्वविद्यालय मेँ भौतिकी के प्राध्यापक थे।इस महान खोज के लिए उन्हे सन1909 मेँ भौतिकी मेँ नोबेल पुरस्कार भी दिया गया।
(कुछ अंश बाल केसरी,20अगस्त2011 से लिए गये हैँ)
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